पाठ 8
भिखारिन
क. “सुबह से शाम तक वह इसी प्रकार हाथ फैलाए खड़ी रहती।”
प्र.1. बुढ़िया की जीविका का साधन क्या था?
उत्तर: बुढ़िया भीख माँगकर अपनी जीविका चलाती थी।
प्र.2. भिखारिन की झोपड़ी कहाँ थी?
उत्तर: भिखारिन की झोपड़ी मंदिर के पास थी।
प्र.3. झोपड़ी के पास पहुँचते ही उसके पास कौन आता था?
उत्तर: झोपड़ी के पास पहुँचते ही उसके पास दस वर्ष का एक लड़का उछलता -कूदना आता और उससे चिपट जाना।
प्र.4. लड़के का क्या नाम था?
उत्तर: लड़के का नाम मोहन था।
प्र.5. बुढ़िया मंदिर के दरवाजे पर क्यों खड़ी रहती थी?
उत्तर- अंधी बुढ़िया प्रतिदिन मंदिर के आगे भिक्षा मांगने के लिए खड़ी होती थी।
प्र.6. बुढ़िया ने अपनी हाँडी किसके पास रखी?
उत्तर- बुढ़िया को डर था कि उसके इकट्ठा किए हुए पैसे कहीं चोरी न हो जाएं, इसलिए उसने अपनी हाँडी सेठ बनारसी दास के पास रखवा दी।
ख. "सेठ जी ने हाँड़ी की ओर देखकर कहा, "इसमें क्या है?"
प्र०1- काशी में सेठ बनारसी दास का व्यक्तित्व कैसा था?
उत्तर- काशी में सेठ बनारसी दास बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति थे। बच्चा-बच्चा उनकी कोठी से परिचित था। बनारसी दास बड़े देवभक्त और धर्मात्मा थे।
प्र०2- अंधी ने हाँड़ी सेठ जी के आगे सरकाते हुए क्या कहा?
उत्तर- अंधी ने हाँड़ी सेठ जी के आगे सरका दी और उसने डरते-डरते कहा "सेठ जी! इसे अपने पास जमा कर लीजिए। मैं अंधी अपाहिज कहाँ रखती फिरूँगी?"
प्र०3- मोहन को सेठ जी ने कैसे पहचाना?
उत्तर- बच्चे को देखकर सेठ को ऐसा लगा कि उस बच्चे की सूरत उसके बेटे मोहन से मिलती है, जो सात वर्ष पूर्व खो गया था। जब उसकी जाँघ पर एक लाल रंग का चिह्न था। इस विचार के आते ही उन्हें विश्वास हो गया कि बच्चा उन्हीं का है।
प्र०4- मोहन ने आँख खोलते ही किसे पुकारा?
उत्तर- मोहन ने आँख खोलने पर अपनी बुढ़िया माँ को पुकारा।
प्र०5- सेठ जी के अनुचित व्यवहार पर बुढ़िया क्या सोच रही थी?
उत्तर- सेठ जी के अनुचित व्यवहार पर उसे रह-रहकर क्रोध आता था। वह सोचती इतना धनी व्यक्ति है, दो-चार रूपये दे देता तो क्या चला जाता? और फिर मैं उससे कुछ दान तो नहीं माँग रही थी, अपने ही रूपये माँग रही थी।
प्र०6- पाठ के लेखक का नाम बताओ-
उत्तर- पाठ के लेखक का नाम रवीन्द्रनाथ टैगोर है।
प्र०7- पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है।
उत्तर- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि स्वार्थ सिद्धि के लिए मानवता को कभी नहीं भूलना चाहिए। मानवीय मूल्य ही आपको महान बनाते हैं। संसार में कर्म प्रधान है धन नहीं।
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