Tuesday, 13 October 2026

panchlight

पचं लाइट' (लेखक: फणीश्वरनाथ 'रेण'ु)
गद्यांश 1
"पि छलेपद्रं ह महीनेसेदंड-जरुमानेके पसै ेजमा करके महतो टोली के पचं ों नेइस बार रामनवमी के मेलेमें
पेट्रोमक्ै स खरीदी है। गाँव मेंसब मि लाकर आठ पचं ायतेंहैं। हर-एक जाति की अलग-अलग 'सभाचट्टी' है। सभी
पचं ायतों मेंदरी, जाजि म, सतरंजी और पेट्रोमक्ै स है- पेट्रोमक्ै स, जि सेगाँववालेपचं लाइट कहतेहैं। पचं लाइट
खरीदनेके बाद पचं ों नेमेलेमेंही तय कि या कि दस रुपयेजो बच गए हैंइससेपजू ा की सामग्री खरीद ली जाए।"
प्रश्न एवंउत्तर:
प्रश्न: महतो टोली के पचं ों नेपेट्रोमक्ै स खरीदनेके लि ए पसै ेकहाँसेजमा कि ए थे?
उत्तर: महतो टोली के पचं ों नेपि छलेपद्रं ह महीनेसेदंड-जरुमानेके पसै ेजमा करके पेट्रोमक्ै स खरीदनेके लि ए धन
इकट्ठा कि या था।
प्रश्न: पचं ों नेपेट्रोमक्ै स कहाँसेखरीदी थी?
उत्तर: पचं ों नेपेट्रोमक्ै स रामनवमी के मेलेसेखरीदी थी।
प्रश्न: गाँव मेंकुल कि तनी पचं ायतेंथी?ं
उत्तर: गाँव मेंकुल मि लाकर आठ पचं ायतेंथीं।
प्रश्न: गाँव के लोग 'पेट्रोमक्ै स' को क्या कहतेथे?
उत्तर: गाँव के लोग 'पेट्रोमक्ै स' को 'पचं लाइट' (पचं लटै ) कहतेथे।
प्रश्न: पेट्रोमक्ै स खरीदनेके बाद बचेहुए दस रुपयों का पचं ों नेक्या कि या?
उत्तर: पेट्रोमक्ै स खरीदनेके बाद बचेहुए दस रुपयों सेपचं ों नेपजू ा की सामग्री खरीदनेका नि र्णयर्ण लि या।
गद्यांश 2
"लेकि न.... ऐन मौके पर 'लेकि न' लग गया! रूदल साह बनि ए की दकु ान सेतीन बोतल कि रासन तले आया और
सवाल पदै ा हुआ, पचं लटै को जलाएगा कौन? यह बात पहलेकि सी के दि माग मेंनहींआई थी। पचं लटै खरीदनेके
पहलेकि सी नेन सोचा। खरीदनेके बाद भी। अब, पजू ा की सामग्री चौके पर सजी हुई है, कीर्तनिर्तनिया लोग
ढोल-करताल खोलकर बठै ेहैंऔर पचं लटै पड़ा हुआ है। गाँववालों नेआज तक कोई ऐसी चीज़ नहीं खरीदी, जि समें
जलाने-बझु ानेका झझं ट हो।"
प्रश्न एवंउत्तर:
प्रश्न: ऐन मौके पर महतो टोली के सामनेक्या समस्या/सवाल पदै ा हुआ?
उत्तर: ऐन मौके पर यह सवाल पदै ा हुआ कि 'पचं लटै (पचं लाइट) को जलाएगा कौन?'
प्रश्न: कि रासन (मि ट्टी का) तले कि स दकु ान सेलाया गया था और कि तनी बोतल आया था?
उत्तर: कि रासन तले रूदल साह बनि ए की दकु ान सेलाया गया था और कुल तीन बोतल तले आया था।
प्रश्न: पचं लाइट न जल पानेके समय टोली मेंपजू ा और कीर्तनर्त की क्या स्थि ति थी?
उत्तर: उस समय पजू ा की सामग्री चौके पर सजी हुई थी और कीर्तनिर्तनिया लोग ढोल-करताल खोलकर पचं लाइट जलने
का इंतज़ार कर रहेथे।
प्रश्न: गाँववालों नेपहलेकभी ऐसी चीज़ क्यों नहीं खरीदी थी?
उत्तर: गाँववालों नेआज तक कोई ऐसी चीज़ नहीं खरीदी थी, जि समेंजलानेऔर बझु ानेका झझं ट या पेचीदगी हो।
प्रश्न: उपर्युक्र्युत गद्यांश कि स पाठ और लेखक द्वारा रचि त कहानी सेलि या गया है?
उत्तर: यह गद्यांश 'पचं लाइट' नामक पाठ सेलि या गया है, जि सके लेखक फणीश्वरनाथ 'रेणु हैं

Neta ji ka chashma


पाठ  का सारांश
  यह कहानी हालदार साहब और नेता जी सुभाषचंद्र बोस के चश्मे के  इर्द-गिर्द घूमती हैं। इस कहानी में कहानीकार स्वयं प्रकाश  एक सामान्य नागरिक कैप्टन चश्मेवाले के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों के योगदान की चर्चा कर रहे हैं, जो अपनी स्तर पर देश के निर्माण में सहयोग देते हैं तथा अपनी देशभक्ति का परिचय देते हैं।
हालदार साहब को हर पँद्रह  दिन कंपनी के काम के सिलसिले में उस कस्बे से गुजरना पड़ता था। जहाँ  किसी उत्साही बोर्ड या प्रशासनिक अधिकारी ने एक बार शहर के मुख्य बाज़ार के मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी। जिसे कस्बे के इकलौते ड्राइंग मास्टर मोतीलाल जी  ने बनाया था।
मूर्ति संगमरमर की थी और लगभग दो फुट ऊँची थी।  मूर्ति  देखने में बहुत सुंदर लगती थी और फौजी वर्दी में थी। एक बात हालदार साहब को खटकती थी।  नेताजी की आँखों  पर चश्मा नही था।  यानी चश्मा तो था,  लेकिन संगमरमर का नहीं था।  एक सामान्य और सचमुच के चश्मे का चौड़ा काला प्रेम मूर्ति को पहना दिया गया था। दूसरी बार जब हालदार साहब उधर से गुजरे तो उन्होंने देखा की पहले  मूर्ति पर मोटे फ्रेम  वाला चौकोर चश्मा था,  अब तार के फ्रेमवाला गोल चश्मा और जब तीसरी बार वहाँ  से गुजरे तो दूसरा चश्मा था।
जब हालदार साहब के मन का कौतूहल बहुत बढ़ गया तो चौराहे पर स्थित पानवाले से पूछ ही लिया कि मूर्ति का चश्मा कैसे बदल जाता है। उत्तर में पानवाला बताता है कि एक कैप्टन चश्मे वाला है जो मूर्ति का चश्मा बदल देता है। हालदार साहब पानवाले से पूछते हैं कि कैप्टन चश्मेवाला चश्मा क्यों बदलता रहता है तो जवाब में पानवाला हालदार साहब को बताता है कि यदि ग्राहक को मूर्ति पर लगा चश्मा पसंद आता है तो कैप्टन वही चश्मा उतार कर ग्राहक को दे देता है और मूर्ति पर दूसरा चश्मा लगा देता है। कैप्टन को  नेताजी के बिना चश्मे की मूर्ति अच्छी नहीं लगती।  कैप्टन एक बेहद बूढ़ा मरियल-सा लंगड़ा आदमी था, जो सिर पर  गाँधी  टोपी और आँखों  पर काला चश्मा पहनता था। हालदार साहब फिर पूछते हैं की ओरिजिनल चश्मा कहाँ है तो पानवाला बताता है कि मास्टर बनाना भूल गया।
दो  साल तक हालदार साहब अपने काम के सिलसिले में उसी कस्बे से गुजरते और मूर्ति के बदलते हुए चश्मे को देखकर प्रसन्न होते। एक दिन ऐसा हुआ कि मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था और आसपास की दुकानें भी बंद थीं, लेकिन जब अगली बार भी चश्मा नहीं दिखाई दिया तो उन्होंने उसी पान वाले से पूछा कि आज तुम्हारे नेता जी की आंखों पर चश्मा क्यों नहीं है। तो उत्तर में पान वाले ने दुखी होकर कहा  “साहब! कैप्टन मर गया।“ हालदार साहब उदास हो गए और वहाँ से  चले गए। जाते-जाते वे सोच रहे थे कि क्या होगा उन लोगों का जो अपने लिए बिकने के मौके ढूंढते है और  उन लोगों पर भी हँसते  हैं जो अपनी जिंदगी, गृहस्थी व जवानी  सब कुछ देश के नाम  कर देते हैं।
पंद्रह दिनों बाद हालदार साहब उसी कस्बे से गुजरते हैं और यह सोचकर निकलते हैं कि वहाँ  पर नहीं रुकेंगे लेकिन वहाँ से गुजरते समय वह कुछ ऐसा देखते हैं जिससे वह गाड़ी को एकदम से रुकवाकर मूर्ति की ओर जाकर अटेंशन में खड़े हो जाते हैं।।, मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना छोटा-सा चश्मा था,  जिसे देखकर हालदार साहब की आँखे भर आईं।

नेता जी का चश्मा
- स्वयं प्रकाश जी 

प्रस्तुत पंक्तियों को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए  -

1.हालदार साहब को हर पंद्रहवें दिन कंपनी के काम के सिलसिले में उस कस्बे से गुजरना पड़ता था।

प्रश्न – 1 कस्बे की क्या क्या विशेषताएँ थी ?

उत्तर – कस्बा बहुत बड़ा नहीं था। कुछ पक्के मकान और एक ही बाज़ार था। एक  लड़कों का स्कूल व एक लड़कियों का स्कूल था। एक सीमेंट का कारखाना था और चौराहे पर नेता जी की  संगमरमर की मूर्ति बनी हुई थी,  जो नगरपालिका द्वारा बनवाई गई थी। नगरपालिका कभी-कभी कवि सम्मेलन भी करवा दिया करती थी। 

प्रश्न – 2 ‘नगरपालिका भी कुछ-न-कुछ करती रहती थी’ - स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर – उस कस्बे की एक नगरपालिका थी जो हमेशा कुछ-न-कुछ करती रहती थी ताकि लोग उन्हें गलत न समझें। इसके लिए कभी कोई  सड़क पक्की करवा दिया करते थे या कभी  कुछ शौचालय बनवा दिया करते थे। अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए वे कभी-कभी कवि सम्मेलन भी करा दिया करते थे। इसी नगरपालिका के किसी उत्साही बोर्ड या प्रशासनिक अधिकारी ने एक बार शहर के मुख्य बाज़ार में चौराहे पर नेता जी सुभाषचंद्र बोस की एक संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी।

प्रश्न – 3 सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा किसने,  कहाँ  लगवाई?  उसे बनाने का काम किसे सौंपा गया और क्यों ? 

उत्तर - नगरपालिका के किसी उत्साही बोर्ड या प्रशासनिक अधिकारी ने  शहर के मुख्य बाज़ार में चौराहे पर नेता जी सुभाषचंद्र बोस की एक संगमरमर की प्रतिमा लगवाई। मूर्ति बनाने की लागत अनुमान और उपलब्ध बजट से कहीं ज़्यादा थी तथा शासनावधि  समाप्त होने को थी। इसलिए  उसे बनाने का काम कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के इकलौते ड्राइंग मास्टर मोतीलाल जी को सौंपा गया। 

प्रश्न – 4 नेता जी की मूर्ति की क्या विशेषताएँ थी?  मूर्ति में किस चीज की कमी थी ? 

उत्तर - मूर्ति की विशेषता यह है कि  वह संगमरमर की बनी थी तथा टोपी के नोक से कोट के दूसरे बटन तक कोई दो  फुट ऊँची थी। मूर्ति बहुत सुंदर लगती थी जिसको देखकर ‘दिल्ली चलो’ और ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ जैसे नारे याद आने लगते थे। केवल एक चीज की कसर थी नेताजी की आँखों पर चश्मा नहीं था। 

2.क्या मतलब?  क्यों चेंज कर देता है?  हालदार साहब अब भी  नहीं समझ पाए? 

प्रश्न - 1 पानवाले ने कैप्टन चश्मेवाले द्वारा नेता जी की मूर्ति का चश्मा चेंज करने के संबंध में क्या बताया? 

उत्तर – पानवाले ने कैप्टन चश्मेवाले द्वारा नेता जी की मूर्ति का चश्मा चेंज करने के संबंध में यह बताया कि जब कैप्टन चश्मेवाले के यहाँ कोई ग्राहक आता है तो उसे वैसा ही फ्रेम वाला चश्मा चाहिए होता है जैसा मूर्ति पर होता है तो वह नेता जी की मूर्ति के ऊपर से चश्मा निकालकर ग्राहक को दे देता है और मूर्ति पर दूसरे फ्रेम का चश्मा लगा देता है जिससे मूर्ति बुरी न लगे। 

प्रश्न - 2 पानवाले की बात सुनकर भी हालदार साहब को कौन-सी बात अभी भी समझ में नहीं आई? 

उत्तर - पानवाले की बात सुनकर हालदार साहब को अभी भी यह समझ नहीं आया था कि नेताजी का असली चश्मा कहाँ है। इस पर पानवाला हालदार साहब को बताता है कि मास्टर चश्मा बनाना भूल गया था। फिर  हालदार साहब को यह समझाया कि एक कैप्टन चश्मेवाला है जिसको नेताजी की बिना चश्मे के मूर्ति अच्छी नहीं लगती इसलिए वह बार-बार नेता जी की मूर्ति पर नया चश्मा लगा देता है।

प्रश्न – 3 पानवाले ने हालदार साहब की बात का क्या उत्तर दिया ?  उसका उत्तर उसके लिए तथा हालदार साहब के लिए अलग-अलग किस प्रकार था ? 

उत्तर - जब कैप्टन चश्मेवाले के यहाँ कोई ग्राहक आता है तो उसे वैसा ही फ्रेम वाला चश्मा चाहिए होता है जैसा मूर्ति पर होता है तो कैप्टन नेता जी की मूर्ति के ऊपर से चश्मा निकालकर ग्राहक को दे देता है और मूर्ति पर दूसरे फ्रेम का चश्मा लगा देता है। यह बात पान वाले के लिए तो एक मज़ेदार बात थी लेकिन हालदार साहब के लिए बहुत ही चकित और द्रवित करने वाली बात थी। 

प्रश्न – 4 मूर्ति बनानेवाले  के संबंध में हालदार साहब के मन में किस प्रकार का भाव जाग्रत हुए ? 

उत्तर – हालदार साहब सोचने लगे कि बेचारे मास्टर मोतीलाल जी ने महीने-भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का वादा किया होगा। बना भी ली होगी और असफल रहा होगा या बनाते-बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया होगा और वह निकल गया होगा। 

3.‘नहीं साब, वो लंगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में ? पागल है,  पागल।  वो  देखो वो आ रहा है। आप उसी से बात कर लो।  फ़ोटो-वोटों छपवा दो उसका कहीं।'

प्रश्न – 1 हालदार साहब को पानवाले की कौन-सी बात अच्छी नहीं लगी और क्यों? 

उत्तर –  हालदार साहब को पानवाले का कैप्टन को पागल कहकर मजाक उड़ाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा क्योंकि कैप्टन चश्मेवाला बूढ़ा व लंगड़ा होकर भी पूरा देशभक्त था।  खुद लंगड़ा होकर भी नेता जी को बुरा नहीं दिखाना चाहता था और इसके लिए को उनकी मूर्ति पर चश्मा लगाता था चाहे वह कैसा भी हो। मास्टर साहब ने तो मूर्ति  बनाकर छोड़ दी लेकिन एक ज़रूरी बात भूल गए की मूर्ति पर चश्मा नहीं था, लेकिन कैप्टन कभी नहीं भूला।
 
प्रश्न – 2 सेनानी न होने पर भी चश्मेवाले को कैप्टन क्यों कहा जाता था?  सोचकर लिखिए। 

उत्तर – सेनानी ने होने पर भी चश्मे वाले को कैप्टन इसलिए कहा जाता था क्योंकि बूढ़ा व लंगड़ा होने पर भी उसने अपनी देशभक्ति नहीं छोड़ी। यदि किसी मनुष्य की आँखों पर चश्मा लगा रहता  है और वह चश्मा उसकी  मूर्ति पर न लगा हो तो हमें उसको देख कर अच्छा नहीं लगता यहाँ तो बात नेता जी की मूर्ति की थी इसलिए कैप्टन मूर्ति पर कोई न कोई चश्मा लगाकर रखता था ताकि नेता जी की मूर्ति अच्छी दिखाई दे। 

 प्रश्न – 3 चश्मेवाले को देखकर हालदार साहब अवाक् क्यों रह गए?  चश्मेवाले का परिचय दीजिए। 

उत्तर – कैप्टन चश्मे वाले को देखकर हालदार साहब अवाक् इसलिए  रह गए क्योंकि वह एक बेहद बूढ़ा मरियल-सा लंगड़ा आदमी था।  उसके सिर पर गांधी टोपी और आंखों पर काला चश्मा लगा रहता था। उस बेचारे की कोई दुकान भी नहीं थी। एक हाथ में एक छोटी-सी संदूकची थी और दूसरे हाथ में एक बाँस पर टंगे हुए चश्मे लिए फेरी लगाता था।

प्रश्न – 4 हालदार साहब पानवाले से क्या पूछना चाहते थे और क्यों?  पानवाले ने उनकी बात पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की? 

उत्तर – हालदार साहब कैप्टन चश्मेवाले की देशभक्ति की भावना देखकर बहुत प्रभावित थे इसलिए पानवाले से पूछना चाहते थे, चश्मेवाले को कैप्टन क्यों कहते हैं?  उसका वास्तविक नाम क्या है? लेकिन पान वाले ने साफ बता दिया था कि वह इस बारे में और बात करने को तैयार नहीं है। 

4. ‘बार-बार सोचते,  क्या होगा उस काम का,  जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी,  जवानी-जिंदगी सब कुछ होम कर देने वालों पर भी हँसती  है और अपने लिए बिकने के मौके ढूंढती है?’

प्रश्न – 1 उपर्युक्त कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर – उपर्युक्त कथन से लेखक का आशय यह है कि जिन लोगों में सिर्फ स्वार्थ की भावना निहित है, भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और  देशप्रेम की भावना नहीं है, वे लोग देश के निर्माण कार्यों  में सहायता कैसे कर सकते हैं। ऐसे लोग उन लोगों पर हँसते हैं जिन्होंने ने अपना घर-गृहस्थी, जवानी, जिंदगी सब कुछ देश पर न्योछावर कर दिया। 

प्रश्न – 2 हालदार साहब को कैप्टन चश्मेवाला देशभक्त क्यों लगा?  स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर –  हालदार साहब को कैप्टन चश्मेवाला देशभक्त इसलिए लगा क्योंकि उसने गरीब और अपाहिज होने के बाद भी नेता जी की मूर्ति पर चश्मा लगाया ताकि उनकी मूर्ति अच्छी दिखाई दे। उसने जीवन की अंत तक एक देशभक्त का जीवन व्यतीत किया। 

प्रश्न – 3 पंद्रह दिन बाद जब हालदार साहब उस कस्बे से गुज़रे तो उनके मन में कौन-कौन सी विचार आ रहे थे? 

उत्तर – पंद्रह दिन बाद जब हालदार साहब उस कस्बे से गुजरे तो उनके मन में यह विचार आ रहे थे कि चौराहे पर सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति होगी लेकिन उस पर चश्मा नहीं होगा क्योंकि मास्टर भूल गया और कैप्टन मर गया।  उन्होंने सोचा कि उस दिन वह वहाँ नहीं रुकेंगे, पान नहीं खाएंगे और मूर्ति को नहीं देखेंगे लेकिन वे आदत से मजबूर थे और वहाँ से गुजरते ही उनकी नजर मूर्ति पर चली  गई। 

प्रश्न – 4 चौराहे पर रुकते हुए हालदार साहब क्या देखकर भावुक हो गए और क्यों? 

उत्तर – चौराहे पर रुकते हुए हालदार साहब भावुक हो गए क्योंकि मूर्ति की आँखों  पर सरकंडे से बना चश्मा रखा हुआ था। वे सोच रहे थे की अब मूर्ति पर चश्मा नहीं होगा जिससे मूर्ति बुरी दिखाई देगी क्योंकि उस  कस्बे में एक ही जो सच्चा देशभक्त था वह मर चुका था, लेकिन जब उन्होंने देखा कि मूर्ति पर चश्मा लगा है तो उनकी आँखे भर आईं क्योंकि उन्हें लगा चश्मेवाले की तरह कुछ और भी लोग देशभक्त हैं।

Thursday, 20 August 2026

Clas 8 Ch 8, मन भावन सावन कविता

पाठ - 6 
मन भवान सावन 

पुस्तक से कविता के शब्द अर्थ करें।
• नीचे दिए गई पंक्तियों को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:-

झम-झम_ _ _ _ _ _ _ घन के।
प्रश्न 1 : बिजली कैसे और किसके उर में चमकती है?
उत्तर : जब आसमान में घनघोर बादल छाए रहते हैं, तब बिजली तेज आवाज के साथ आसमान में गरजती है। ऐसा लगता है मानो बादलों को चीरती हुई पृथ्वी पर आ गिरी हो और तेज़ गड़गड़ाहट की आवाज करती है।

प्रश्न 2 : कविता में कवि ने किस ऋतु का वर्णन किया है?
उत्तर : कविता में कवि ने वर्षा ऋतु में आने वाले सावन के महीने का वर्णन किया है।

प्रश्न 3 : सावन के मेघ कैसे बरसते हैं?
उत्तर : सावन के मेघ झम-झम बरसते हैं और उनकी छन-छम करती बूंदें पेड़ों की शाखाओं से छन-छन कर गिरती हैं।

प्रश्न 4 : कविता व उसके रचयिता का नाम बताइए।
उत्तर : कविता का नाम 'मन भावन सावन' है तथा रचयिता का नाम 'सुमित्रानंदन पंत जी' है।

प्रश्न 5 : तरुओं, उर, तम शब्दों के अर्थ बताइए।
उत्तर : वृक्षों, हृदय, अंधकार।

 2. नाच रहे पागल हो _ _ _ _ _ _ _ गर्जन।
प्र०1 : सावन में मेघ किस प्रकार की ध्वनि करते हुए बरसते हैं?
उ०1 : सावन में मेघ झम-झम की ध्वनि करते हुए बरसते हैं।

प्र०2 : पीपल और नीम अपनी प्रसन्नता किस प्रकार प्रकट करते हैं?
उ०2 : दोनों पीपल और नीम झूम-झूमकर आनंदित हो रहे हैं और दोनों खुशी के साथ नाच रहे हैं।

प्र०3 : कवि ने सावन के गीत किस झूले में बैठकर गाने की इच्छा प्रकट की  है?
उ०3 : कवि ने सावन के गीत इंद्रधनुष के झूले में बैठकर गाने की इच्छा प्रकट की है।

प्र०4 : सावन में प्रकृति की शोभा का वर्णन कीजिए:-
उ०4 : सावन ऋतु में प्रकृति अत्यधिक सुन्दर दिखाई देती है। चारों ओर प्रसन्नता व हरियाली छाई रहती है भ्रमर व मयूर प्रसन्न होकर गुंजार व नृत्य करने लगते हैं। वृक्षों की शाखाओं पर झूले डल जाते हैं और सभी जगह फूलों की सुगंध से वातावरण सुगंधित हो उठता है।

प्र० 5 : इस कविता से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उ० 5 : इस कविता से हमें प्रेरणा मिलती है कि प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आचरण और व्यवहार द्वारा जन-जन के जीवन में सावन का उल्लास भरने का प्रयास करें।


Wednesday, 12 August 2026

Class 8 संस्कृत पाठ 5 : दिल्ली नगरम

दिल्ली नगर भारतवर्ष की राजधानी है। यह नगर अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक है। इसका पुराना नाम 'इंद्रप्रस्थ' था। भारत के केंद्र में स्थित होने के कारण यह नगर अति प्राचीन काल से देश की राजधानी होने का गौरव वहन कर रहा है। आज भी यह स्वतंत्र भारत की राजधानी है। केंद्र सरकार के सर्वोच्च अधिकारी और विदेशों के प्रतिनिधि यहीं निवास करते हैं।
दिल्ली नगर में भारत के विभिन्न प्रदेशों के निवासी आसानी से देखे जा सकते हैं। दूर-दूर से आकर लोग यहाँ प्राचीन और नवीन अनेक दर्शनीय स्थलों को देखकर अपना मनोरंजन करते हैं।
दिल्ली नगर का प्राचीन भाग 'पुराणी दिल्ली' नाम से जाना जाता है, और वहाँ 'चांदनी चौक', 'लाल किला', 'जामा मस्जिद', 'यमुना पुल' तथा 'राजघाट' नाम के दर्शनीय स्थान हैं। पुरानी दिल्ली भाग के भवन प्राचीन शैली में निर्मित हैं। वहाँ भारत की संस्कृति और कला झलकती है। दिल्ली नगर का नया भाग 'नई दिल्ली' नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ चिड़ियाघर, बिड़ला मंदिर, जंतर-मंतर और कुतुब मीनार प्रसिद्ध स्थान हैं। जब दिल्ली नगर में 'एशियाड 82' (1982 के एशियाई खेल) का आयोजन हुआ था, उसी आयोजन से इस नगर की शोभा अत्यंत बढ़ गई थी।
यहाँ नेहरू स्टेडियम, नेशनल स्टेडियम और इंदिरा गांधी (इंद्रप्रस्थ) स्टेडियम आदि विभिन्न विशाल खेल के मैदान भली-भांति निर्मित हैं। ऊँचे फ्लाईओवर (पारगमन पथ) सुंदर प्रतीत होते हैं। नई दिल्ली नगर में मार्ग अत्यंत चौड़े, सुव्यवस्थित और स्वच्छ हैं। रात में यहाँ विभिन्न प्रकार की बत्तियों (लाइटों) का प्रकाश बहुत सुशोभित होता है। यहाँ अनेक प्रकार के वाहनों का बहुत बड़ा आवागमन रहता है। पालम में स्थित हवाई अड्डा अत्यंत दर्शनीय है।
दिल्ली नगर व्यापार और उद्योगों का भी केंद्र है। यह संपूर्ण संसार की राजनीतिक गतिविधियों का भी केंद्र है। अतः यह नगर अत्यंत समृद्ध, वैभवशाली और सुंदर है।

Class 8, पाठ 4: परिश्रमैव समृद्धेः मूलम्



एक समय की बात है, भगवान् विष्णु (हरि) ने स्वर्ग और नरक का निर्माण किया। उन्होंने इन्द्र को स्वर्ग का स्वामी बनाया और यमराज को नरक का स्वामी बनाया।

उस दिन से स्वर्ग में प्रतिदिन लोग आने लगे। लेकिन यमलोक (नरक) में किसी का भी आगमन नहीं होता था। इस कारण स्वर्ग जीवंत और आनंदमय हो गया, जबकि नरक निष्क्रिय और सुनसान पड़ा रहने लगा।

नरक की इस निष्क्रियता को देखकर यमराज चिंतित हो गए। वे अपना अधिकार छोड़ने के लिए भगवान् हरि के पास गए और प्रार्थना करने लगे — 

“भगवन्! मैं अपना अधिकार छोड़ना चाहता हूँ। कृपया मुझे इस भार से मुक्ति प्रदान करें।”

हरि ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा — “भगवान्! आप इस प्रकार क्यों चिंतित हैं? यह तो स्वाभाविक है। पृथ्वीलोक में लोग धार्मिक और नैतिक गुणों से सम्पन्न हैं, इसलिए वे स्वर्ग ही आते हैं।”

भगवान् हरि के ये वचन सुनकर यमराज संतुष्ट हो गए और चुप हो गए।

उसी समय भगवान् हरि के पास बैठी कमला (लक्ष्मी) ने उनसे प्रार्थना की — 

“भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के निवासियों को स्वर्ग प्राप्ति का रहस्य जानना चाहती हूँ। अतः आप और मैं वहाँ चलकर देखें।”

तब कमला हरि के साथ पृथ्वीलोक चली गईं। यमराज भी उनके साथ गए।

वहाँ उन्होंने देखा कि पृथ्वीलोक के सभी लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। उनका जीवन तपस्या के योग्य था। शहरों और गाँवों में मजदूर और किसान पूरी लगन से काम कर रहे थे। 

इन्हीं लोगों के परिश्रम से पृथ्वीलोक में सुख और समृद्धि सुशोभित हो रही थी। इसलिए अंत में वे सभी स्वर्गलोक को प्राप्त करते थे।

तब कमला ने कहा — “भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के लोगों को स्वयं यह वरदान देना चाहती हूँ।”

भगवान् हरि की आज्ञा से कमला पृथ्वीलोक में रहने लगीं।

तब से पृथ्वीवासी कमला के वैभव (धन-समृद्धि) के लोभ में पड़ गए। वे परिश्रम कम करने लगे। परिश्रम के त्याग से उनके सुख और समृद्धि नष्ट होने लगी, सदाचार समाप्त हो गया। वे भ्रष्टाचारी बन गए और अंत में नरक जाने लगे।

यह देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए और अपने लोक लौट आए।

तब भगवान् हरि ने कमला से कहा — 

“देवि! अब तुम्हें पृथ्वीलोक की सुख-समृद्धि का रहस्य ज्ञात हो गया 
 — परिश्रम ही समृद्धि का मूल है।**


Thursday, 30 July 2026

चलना हमारा काम है


चलना हमारा काम है 
कवि – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

 निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए – 

1. गति प्रबल पैरों में भरी,
  फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा,
  जब आज मेरे सामने 
  है रास्ता इतना पड़ा।
  जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है।
  चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1 ‘गति प्रबल पैरों में भरी’ – पंक्ति द्वारा कवि मनुष्य को क्या संदेश दे रहा है?
उत्तर – इस पंक्ति द्वारा कवि मनुष्य को यह संदेश दे रहे हैं कि मनुष्य को जीवन पथ पर अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निरंतर सक्रिय और गतिशील रहना चाहिए।

प्रश्न – 2 मनुष्य कवि को दर-दर पर खड़ा न होने की प्रेरणा क्यों दे रहा है?
उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि मनुष्य को यह प्रेरणा देना चाहते हैं कि जब मनुष्य में इतनी शक्ति और सामर्थ्य है कि वह जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकता है तो उसे फिर दर-दर भटकने या खड़े होने की क्या आवश्यकता है। जब उसके पैरों में अद्भुत गति एवं शक्ति विद्यमान हैं तो उसे जगह-जगह रुकना नहीं चाहिए। उसे लगातार चलते रहना चाहिए अर्थात् जब तक उसके मंजिल उसे नए मिल जाए, तब तक सतत प्रयास करते रहना चाहिए और दर-दर खड़ा होने के बजाय चुनौतियों का सामना करते हुए अपने लक्ष्य प्राप्ति की ओर बढ़ते रहना चाहिए।

प्रश्न – 3 ‘जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है’ पंक्ति द्वारा कवि क्या स्पष्ट करना चाहता है?
उत्तर – इस पंक्ति के द्वारा कवि यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि जब तक मनुष्य अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच जाता तब तक वह विश्राम नहीं करेगा और चलता रहेगा और अपनी मंजिल पाने के लिए निरंतर प्रयास करता रहेगा।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों में कवि मनुष्य को प्रेरणा दे रहा है कि उसे जीवन में निरंतर सक्रिय और गतिशील रहना चाहिए। मनुष्य को दर-दर खड़ा होने के बजाय निरंतर चुनौतियों का सामना करना चाहिए। कवि अभी अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच पाया है। अभी उसके सामने लंबा रास्ता पड़ा है, जब तक वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक वह विश्राम नहीं कर सकता।

2. कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया 
 कुछ बोल अपना बँट गया,
 अच्छा हुआ तुम मिल गईं 
 कुछ रास्ता ही कट गया।
 क्या राम में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है।
 चलना हमारा काम है। 

प्रश्न – 1 ‘कुछ बोझ अपना बँट गया’ - कवि ने यह कहने का क्या भाव है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्ति के माध्यम से कवि कहना चाहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहते हुए वह बहुत लोगों से मिलता है। अपने जीवन पथ पर चलते हुए वह जिन लोगों से मिलता है उनसे अपना सुख दुख कहता है और कुछ दूसरों की सुनता है। ऐसा करने से उसके मन का बोझ हल्का हो जाता है और प्रेम व स्नेह की वृद्धि भी होती है। अर्थात् जब एक दूसरे से मन की बातें कह दी जाती हैं तब मन में शांति की अनुभूति होती है और मनुष्य आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होता है।

प्रश्न – 2 ‘अच्छा हुआ तुम मिल गई’- कवि को कौन, कहाँ मिल गई? उसके मिलने से उसे क्या लाभ हुआ? 
उत्तर – इस पंक्ति में कवि को उसकी प्रेमिका जीवन के मार्ग पर चलते हुए मिल गई। उसके मिलने से उसे यह लाभ हुआ कि उसके जीवन का कुछ समय आसानी से बीत गया और रास्ता आसानी से कट गया।

प्रश्न – 3 कवि अपना परिचय किस रूप में देता है और क्यों?
उत्तर –  कवि ने जीवन पथ पर चलते हुए अपना परिचय एक पथिक के रूप में दिया है। उनका कहना है कि राह पर चलते हुए वह एकमात्र पथिक है, जिसका काम चलते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति करना है। जिस प्रकार रास्ते में चलने वाला हर व्यक्ति केवल राही (पथिक) होता है और अपने गंतव्य की ओर बढ़ता जाता है। उसी प्रकार वह भी जीवन में निरंतर उन्नति के पथ पर चलते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त करना चाहते हैं। 

3. जीवन अपूर्ण लिए हुए 
 पाता कभी, खोता कभी 
 आशा-निराशा से घिरा 
  हँसता कभी, रोता कभी।
  गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है।
  चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1 कवि ने जीवन को अपूर्ण क्यों कहा है?
उत्तर – कवि का कहना है कि मनुष्य का जीवन अपूर्ण होता है क्योंकि उसके जीवन में सफलता के साथ असफलता, सुख के साथ दुख और सहजता के साथ बाधाएं आती रहती है। यही जीवन है। अर्थात् मनुष्य का जीवन अपूर्ण होता है। जीवन के दो पहलू होते हैं जिसमें आशा-निराशा, सुख-दुख दोनों ही होते हैं और इनका क्रम बना रहता है। समय परिवर्तनशील होता है। अतः मनुष्य के जीवन में भी सदैव एक जैसी स्थिति नहीं रहती है, जिससे उसके जीवन में अपूर्णता बनी रहती है।

प्रश्न – 2 उपर्युक्त पंक्तियों में जीवन की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों में जीवन में आने वाली सफलता-असफलता, सुख-दुख एवं आशा-निराशा की ओर संकेत किया गया है। यही जीवन की विशेषताएँ हैं।

प्रश्न – 3 ‘गति-मति न हो अवरुद्ध’ - पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – इस पंक्ति का यह आशय है कि हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों के कारण हमारी गति कभी नहीं रुक सकती क्योंकि गति ही जीवन है। अतः हमें अपने लक्ष्य की ओर निरंतर गतिशील बने रहना चाहिए।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कवि मनुष्य को क्या प्रेरणा दे रहा है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों के माध्यम से कवि ने मनुष्य को यह प्रेरणा दी है कि सुख-दुख, सफलता-असफलता आदि के कारण मनुष्य की गति रुकनी नहीं चाहिए तथा उसे निरंतर जीवन पथ पर गतिशील बने रहना चाहिए क्योंकि जीवन में कोई स्थिति सदा के लिए नहीं रहती।

4. इस विशद विश्व-प्रवाह में 
 किसको नहीं बहाना पड़ा 
 सुख – दुख हमारी ही तरह 
 किसको नहीं सहना पड़ा।
 फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है।
 चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने मानव-जीवन की किस सच्चाई को उजागर किया है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्ति के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की इस सच्चाई को उजागर किया है कि मानव जीवन में सभी को सुख-दुख, आशा-निराशा तथा असफलता-सफलता से प्रभावित होना अनिवार्य है।

प्रश्न – 2 ‘फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है’- पंक्ति द्वारा कवि क्या संकेत कर रहा है तथा क्यों?
उत्तर – इस पंक्ति द्वारा कवि यह संकेत कर रहा है कि संसार में ऐसे लोग हैं जो भाग्यवादी है तथा दुख या असफलता का सामना होने पर यह तक कहा करते है कि मेरा भाग्य खराब है।

प्रश्न – 3 उपर्युक्त पंक्तियों में भाग्य पर रोने को मनुष्य के किस दुर्बलता के निशानी बताया गया है?
उत्तर – इस पंक्ति में भाग्य पर रोने को मनुष्य में धैर्य और साहस न होने की दुर्बलता की निशानी को बताया गया है।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कवि क्या संदेश दे रहा है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्ति में कवि है यह संदेश दे रहा है कि जीवन पथ की बाधाओं पर विजय प्राप्त करते हुए धैर्य और साहस से आगे बढ़ते रहना चाहिए।

5. मै पूर्णता की खोज में 
दर-दर भटकता ही रहा 
प्रत्येक पग पर कुछ-न-कुछ 
रोड़ा अटकता ही रहा 
पर हो निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है।
चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1 ‘ मैं पूर्णता की खोज में, दर-दर भटकता ही रहा’- पंक्ति द्वारा कवि का क्या आशय है?
उत्तर – ‘मैं पूर्णता की खोज में, दर-दर भटकता ही रहा’ पंक्ति में कवि कहता है कि मनुष्य का जीवन अपूर्ण होता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में गुण और अवगुण दोनों का समावेश होना निश्चित है, वैसे ही सुख-दुख, सफलता-असफलता भी जीवन के दो पहलू हैं। कवि कहता है कि मनुष्य संपूर्ण मानव बनना चाहता है और यही कारण है कि वह दरवाजे-दरवाजे पर भटकता रहता ह। वास्तव में मानव का जीवन सुख-दुख, आशा-निराशा, सफलता-असफलता आदि से भरा है। अतः मनुष्य को इसे सहजता से स्वीकार कर जीवन पथ पर निरंतर कर्म करते रहने चाहिए।

प्रश्न – 2 ‘प्रत्येक पग पर कुछ-न-कुछ रोड़ा अटकता ही रहा’- पंक्ति द्वारा मानव-जीवन की किस सच्चाई को उजागर किया गया है?
उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि मानव जीवन कि इस सच्चाई को उजागर करते हैं कि मानव जीवन में दुख, निराशा और असफलता आते जाते रहते हैं।

प्रश्न – 3 ‘जीवन इसी का नाम है’- पंक्ति द्वारा कवि ने मानव जीवन के संबंध में क्या कहा है?
उत्तर – इस पंक्ति द्वारा कवि ने मानव जीवन के संबंध में यह कहा है कि जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए हमें अनेक प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि वह स्वाभाविक है।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों के द्वारा स्पष्ट कीजिए कि जीवन में आने वाली बाधाओं का सामना हमें किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा जीवन में आने वाली बाधाओं का सामना हमें निरंतर गतिशील, विनयशील एवं कर्तव्यनिष्ठ होकर करना चाहिए क्योंकि यही मानव का कर्तव्य है।

6. कुछ साथ में चलते रहे 
 कुछ बीच ही से फिर गए।
 पर गति न जीवन की रुकी 
 जो गिर गए सो गिर गए 
 चलता रहे हरदम, उसी की सफलता अभिराम है।
 चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1 ‘कुछ साथ में चलते रहे, कुछ बीच से ही फिर गए’- पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर – इस पंक्ति में कवि यह कहना चाहता हैं कि मनुष्य को जीवन पथ पर बढ़ते हुए अनेक साथी मिलते है, जिसमें से कुछ बीच में उसका साथ छोड़ देते हैं, तो कुछ निराश होकर लौट जाते हैं। परंतु ऐसा होने पर भी उसके जीवन की गति नही रुकती । वह निरंतर रूप से जीवन पथ पर अग्रसर होता रहता है ।

प्रश्न – 2 ‘चलना हमारा काम है’- कविता में भाग्यवाद पर किस प्रकार चोट की गई है?
उत्तर – इस कविता में भाग्यवाद पर इस प्रकार चोट की गई है कि दुख या असफलता का सामना होने पर लोग कहते हैं कि उनका भाग्य खराब है।कवि के अनुसार ऐसे लोग नहीं जानते कि सुख और दुख दोनों जीवन के अनिवार्य अंग है। इसलिए कवि के अनुसार दुख से विचलित होकर भाग्य को दोष देना उचित नहीं होता है 

प्रश्न – 3 कवि के अनुसार जीवन में सफलता कैसे मिलती है?
उत्तर – कवि के अनुसार जीवन में सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है जो संकट और दुखों तथा निराशा का सामना करके दृढ़ता से खड़ा रहे और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता रहे।

प्रश्न – 4 कवि ने कविता में ‘चलना हमारा काम है’- पंक्ति को बार-बार क्यों दोहराया गया है? कवि इससे क्या प्रेरणा दे रहा है?
उत्तर – कवि कविता में ‘चलना हमारा काम है’ पंक्ति को बार-बार दोहराकर संदेश देना चाहते हैं कि मनुष्य को हमेशा प्रयत्नशील, गतिशील रहना चाहिए तभी हमारा जन्म सार्थक होगा क्योंकि कर्मशील व्यक्ति मरकर भी अमर होते है। अर्थात् आशा-निराशा, सुख-दुख, असफलता और किसी भी विषम परिस्थिति में हमें अपने लक्ष्य को नहीं भूलना चाहिए और निरंतर अपने लक्ष्य प्राप्ति के पथ पर चलते रहना चाहिए।


Thursday, 23 July 2026

Class 8, पाठ 1 प्रभातवेला

पाठ - 1
प्रभातवेला 


​रात बीत जाने पर प्रभात (सुबह) का समय आता है। प्रातःकाल की सुंदरता अत्यंत रमणीय (सुंदर) होती है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त के समय सुबह चार बजे से शुरू होता है और सूर्योदय तक का समय प्रभातवेला (सुबह का समय) ही कहा जाता है। यह समय चौबीसों घंटों में सबसे श्रेष्ठ और सर्वोत्तम होता है।
​प्रभातकाल में प्रकृति की शोभा भी अत्यंत मनमोहक होती है। एक ओर सूर्योदय के समय सूर्य का लाल बिंब (गोला) मन को हर लेता है, तो दूसरी ओर सोकर उठे हुए पक्षी अपनी मधुर चहचहाहट से शांत भूमंडल को संगीत से भर देते हैं। वनों में, बगीचों में, नदी के तटों पर और खेतों में ठंडी, मंद और सुगंधित हवा बहती है। सुबह के समय शुद्ध वायु में घूमने से स्वास्थ्य बढ़ता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष, स्त्रियां और बच्चे सुबह टहलने के लिए जाते हैं, और युवा व्यायाम करते हैं तथा शक्ति और स्वास्थ्य प्राप्त करते हैं।
​
​प्रातःकाल वृक्षों की हरी-भरी शोभा और फूलों की सुगंध टहलने वाले लोगों के नेत्रों और मन को प्रसन्न करती है। ब्रह्ममुहूर्त में अध्ययनशील (पढ़ने वाले) विद्यार्थी उठकर विद्या प्राप्त करते हैं। वे पढ़े हुए पाठों का अभ्यास करते हैं और कई विषयों को कंठस्थ (याद) करते हैं।
​
​इस प्रकार प्रभातवेला में प्रसन्न हुए सभी लोग अपने-अपने कार्यों में लगे हुए दिखाई देते हैं। ऑक्सीजन युक्त वायु से शक्ति प्राप्त करके लोग शाम तक स्वस्थ मन और शरीर से काम करते हैं और थकान का अनुभव नहीं करते हैं।
​इसलिए, हमें भी हमेशा सूर्योदय से पहले ही उठकर उद्यानों (बगीचों) आदि में नियमानुसार/समय पर घूमकर घर वापस आना चाहिए। इसके बाद स्नान करके पढ़ाई में और अपने अन्य दैनिक कार्यों में लग जाना चाहिए।

Class 8, पाठ 3 : नीतिवाचनानि

संस्कृत:
अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशोबलम् ॥ १ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो व्यक्ति अभिवादन (नमस्कार) करने वाला और प्रतिदिन बड़ों (वृद्धों) की सेवा करने वाला होता है, उसके चार चीजें बढ़ती हैं — आयु, विद्या, यश और बल।
2.
संस्कृत:
प्रियवाक्य-प्रवदनेन, सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात्तदेव वक्तव्यम्, वचने का दरिद्रता ॥ २ ॥
हिंदी अनुवाद:
प्रिय वचन (मीठी बात) बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए वही बोलना चाहिए। बातों में दरिद्रता (कंजूसी) क्या है?
3.
संस्कृत:
मनसा चिन्तितं कार्यं, वाचा नैव प्रकाशयेत् ।
मनवद् रहस्यं गूढं, कार्यं चापि नियोजयेत् ॥ ३ ॥
हिंदी अनुवाद:
मन में सोचा हुआ काम वाणी (मुँह) से प्रकट नहीं करना चाहिए। मन की तरह रहस्य को गुप्त रखना चाहिए और कार्य को भी गुप्त रूप से पूरा करना चाहिए।
4.
संस्कृत:
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ ४ ॥
हिंदी अनुवाद:
इस पृथ्वी पर तीन रत्न हैं — जल, अन्न और सुंदर वचन (सुभाषित)। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों में ही रत्न समझते हैं।
5.
संस्कृत:
स्वभावाद् बलमाश्रित्य, यो हि जीवति मानवः ।
स लोके लभते कीर्तिं, परत्र च शुभां गतिम् ॥ ५ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो मानव अपने स्वभाव के बल पर जीवित रहता है, वह इस लोक में कीर्ति (यश) प्राप्त करता है और परलोक में भी शुभ गति प्राप्त करता है।
6.
संस्कृत:
मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पण्डितः ॥ ६ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो परायी स्त्रियों को माँ के समान, पराये धन को मिट्टी के ढेले के समान और समस्त प्राणियों को अपने समान देखता है, वही पंडित (सच्चा विद्वान) है।

Wednesday, 22 July 2026

Class 7 Sanskrit ch 4

दक्षिण दिशा में महिला रोप्य नाम का एक नगर था। उस नगर में एक विशाल बरगद का पेड़ (वटवृक्ष) था। वृक्ष के ऊपर बहुत से पक्षी घोंसलों में रहते थे।
​एक बार एक शिकारी उस नगर में आया। उसने बरगद के पेड़ के नीचे जाल फैलाकर उसके ऊपर चावल के दाने बिखेर दिए, और स्वयं पास में ही छिपकर बैठ गया।
​इसके बाद चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा आकाश में उड़ रहा था। उसके साथ बहुत से कबूतर भी थे। जब उन्होंने धरती पर चावल के दाने देखे, तब वे उन्हें खाने के लिए नीचे आए। इस प्रकार वे सभी लालच के कारण जाल में फँस गए।
​चित्रग्रीव बहुत बुद्धिमान था। उसने शिकारी को देखकर कबूतरों से कहा—
​"तुम सब चिंताकुल (व्याकुल) मत हो, बल्कि इस जाल को लेकर साथ ही शीघ्रता से उड़ जाओ।"
​चित्रग्रीव के कहने के अनुसार सभी कबूतर जाल के साथ ही उड़ गए।
​चित्रग्रीव कबूतरों को वन के उस भाग में ले गया, जहाँ हिरण्यक नाम का चूहा रहता था। हिरण्यक उसका मित्र था। चित्रग्रीव के आदेश से सभी कबूतर वहाँ उतरे।
​चित्रग्रीव ने हिरण्यक को सारा वृत्तान्त (हाल) बताया और प्रार्थना की— "हे मित्र! इस जाल को काटकर मेरे परिवारजनों (साथियों) को बंधन से मुक्त करो।"
​चित्रग्रीव के आग्रह पर हिरण्यक ने शीघ्र ही उनका जाल काट दिया। इस प्रकार वे कबूतर जाल से स्वतंत्र हो गए और उन्होंने पुनः (नया) जीवन प्राप्त किया।
​सच ही कहा गया है—
​संघे शक्तिः, भेदे नाशः।
(संगठन/एकता में शक्ति होती है और फूट में नाश होता है।)

Monday, 20 July 2026

sanskrit Class 6 path 9 ahm vriksha asmi

मैं वृक्ष हूँ। पादप, तरु, वितप — ये सभी मेरे ही नाम हैं। मैं स्वयं धूप में खड़ा रहता हूँ और दूसरों को छाया प्रदान करता हूँ। मेरी शाखाओं में पक्षी घोंसले बनाते हैं। मेरे फल पशुओं के लिए आहार बनते हैं। मेरे फल, फूल, पत्ते, लकड़ी, जड़ें और छोटी-छोटी टहनियाँ — मेरा हर अंग दूसरों के हित के लिए होता है।
मैं वातावरण को शुद्ध करता हूँ। वर्षा के मौसम में भी मैं सहायक हूँ। मैं ही जल-प्रलय से धरती की रक्षा करता हूँ। मेरे बिना घरों, जंगलों और बगीचों की शोभा नहीं है। मूर्ख लोग छोटे-छोटे लाभ के लिए मुझे काटते हैं। इससे मुझे बहुत कष्ट होता है।
वृक्षों के जीवन से ही संसार का जीवन है। इसलिए हमारी रक्षा करना मानव का कर्तव्य है। हम तो दूसरों के कल्याण के लिए ही जीते हैं। कवि सत्य कहते हैं —
जो अपना सर्वस्व अर्पित करते हैं,
पराये हित के लिए ही,
वे वृक्ष सदैव जीवित रहें,
पृथ्वी पर सज्जनों की तरह॥

Class 8, पाठ 2 समयस्य सदुपयोग :

इस संसार में मानव जीवन दुर्लभ है। वहाँ (संसार में) मनुष्य जन्म लेकर भी मनुष्य समय का महत्त्व नहीं जानता। मानव जीवन में समय का बहुत महत्त्व है।

​संसार में अन्य नष्ट हुई वस्तुएँ पुनः प्राप्त की जा सकती हैं, परंतु बीता हुआ समय किसी भी उपाय से पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति की आयु का जो हिस्सा व्यर्थ चला गया, वह चला ही गया। अतः ऐसा प्रयत्न करना चाहिए जिससे एक क्षण का भी दुरुपयोग न हो, क्योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

​संसार में बहुत से लोग व्यर्थ में ही इधर-उधर घूमकर समय बिताते हैं। कुछ लोग तो आलस के कारण निरंतर बैठे ही रहते हैं। आलस के कारण वे अपने दैनिक कार्य भी नियम से नहीं करते। इसलिए वे रोगी हो जाते हैं। कुछ आलसी लोग तो खेलने में या सोने में ही अपना सारा समय बिता देते हैं और अपने जीवन के बहुमूल्य हिस्से को व्यर्थ गँवा देते हैं।
​समय का सदुपयोग जीवन की सफलता की पहली सीढ़ी, उन्नति का मूल मंत्र और आत्म-निर्माण का उत्तम साधन है। प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है कि किसी को भी समय का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। जो लोग कभी भी समय का दुरुपयोग नहीं करते और सदैव काम में लगे रहते हैं, वे सुख से रहते हैं। ऐसे कर्मवीर ही सब जगह श्रेष्ठ पद प्राप्त करते हैं।
​छात्रों के लिए तो समय का सदुपयोग ही उन्नति का साधन है। जो छात्र समय का सदुपयोग करके पढ़ाई करते हैं, वे अपने जीवन में सफल होते हैं। इस प्रकार समय का सदुपयोग मनुष्यों के कल्याण के लिए होता है।

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पचं लाइट' (लेखक: फणीश्वरनाथ 'रेण'ु) गद्यांश 1 "पि छलेपद्रं ह महीनेसेदंड-जरुमानेके पसै ेजमा करके महतो टोली के पचं ों नेइस बा...