Thursday, 23 July 2026

Class 8, पाठ 1 प्रभातवेला

पाठ - 1
प्रभातवेला 


​रात बीत जाने पर प्रभात (सुबह) का समय आता है। प्रातःकाल की सुंदरता अत्यंत रमणीय (सुंदर) होती है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त के समय सुबह चार बजे से शुरू होता है और सूर्योदय तक का समय प्रभातवेला (सुबह का समय) ही कहा जाता है। यह समय चौबीसों घंटों में सबसे श्रेष्ठ और सर्वोत्तम होता है।
​प्रभातकाल में प्रकृति की शोभा भी अत्यंत मनमोहक होती है। एक ओर सूर्योदय के समय सूर्य का लाल बिंब (गोला) मन को हर लेता है, तो दूसरी ओर सोकर उठे हुए पक्षी अपनी मधुर चहचहाहट से शांत भूमंडल को संगीत से भर देते हैं। वनों में, बगीचों में, नदी के तटों पर और खेतों में ठंडी, मंद और सुगंधित हवा बहती है। सुबह के समय शुद्ध वायु में घूमने से स्वास्थ्य बढ़ता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष, स्त्रियां और बच्चे सुबह टहलने के लिए जाते हैं, और युवा व्यायाम करते हैं तथा शक्ति और स्वास्थ्य प्राप्त करते हैं।
​प्रातःकाल वृक्षों की हरी-भरी शोभा और फूलों की सुगंध टहलने वाले लोगों के नेत्रों और मन को प्रसन्न करती है। ब्रह्ममुहूर्त में अध्ययनशील (पढ़ने वाले) विद्यार्थी उठकर विद्या प्राप्त करते हैं। वे पढ़े हुए पाठों का अभ्यास करते हैं और कई विषयों को कंठस्थ (याद) करते हैं।
​इस प्रकार प्रभातवेला में प्रसन्न हुए सभी लोग अपने-अपने कार्यों में लगे हुए दिखाई देते हैं। ऑक्सीजन युक्त वायु से शक्ति प्राप्त करके लोग शाम तक स्वस्थ मन और शरीर से काम करते हैं और थकान का अनुभव नहीं करते हैं।
​इसलिए, हमें भी हमेशा सूर्योदय से पहले ही उठकर उद्यानों (बगीचों) आदि में नियमानुसार/समय पर घूमकर घर वापस आना चाहिए। इसके बाद स्नान करके पढ़ाई में और अपने अन्य दैनिक कार्यों में लग जाना चाहिए।

Class 8, पाठ 3 : नीतिवाचनानि

संस्कृत:
अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशोबलम् ॥ १ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो व्यक्ति अभिवादन (नमस्कार) करने वाला और प्रतिदिन बड़ों (वृद्धों) की सेवा करने वाला होता है, उसके चार चीजें बढ़ती हैं — आयु, विद्या, यश और बल।
2.
संस्कृत:
प्रियवाक्य-प्रवदनेन, सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात्तदेव वक्तव्यम्, वचने का दरिद्रता ॥ २ ॥
हिंदी अनुवाद:
प्रिय वचन (मीठी बात) बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए वही बोलना चाहिए। बातों में दरिद्रता (कंजूसी) क्या है?
3.
संस्कृत:
मनसा चिन्तितं कार्यं, वाचा नैव प्रकाशयेत् ।
मनवद् रहस्यं गूढं, कार्यं चापि नियोजयेत् ॥ ३ ॥
हिंदी अनुवाद:
मन में सोचा हुआ काम वाणी (मुँह) से प्रकट नहीं करना चाहिए। मन की तरह रहस्य को गुप्त रखना चाहिए और कार्य को भी गुप्त रूप से पूरा करना चाहिए।
4.
संस्कृत:
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ ४ ॥
हिंदी अनुवाद:
इस पृथ्वी पर तीन रत्न हैं — जल, अन्न और सुंदर वचन (सुभाषित)। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों में ही रत्न समझते हैं।
5.
संस्कृत:
स्वभावाद् बलमाश्रित्य, यो हि जीवति मानवः ।
स लोके लभते कीर्तिं, परत्र च शुभां गतिम् ॥ ५ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो मानव अपने स्वभाव के बल पर जीवित रहता है, वह इस लोक में कीर्ति (यश) प्राप्त करता है और परलोक में भी शुभ गति प्राप्त करता है।
6.
संस्कृत:
मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पण्डितः ॥ ६ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो परायी स्त्रियों को माँ के समान, पराये धन को मिट्टी के ढेले के समान और समस्त प्राणियों को अपने समान देखता है, वही पंडित (सच्चा विद्वान) है।

Wednesday, 22 July 2026

Class 7 Sanskrit ch 4

दक्षिण दिशा में महिला रोप्य नाम का एक नगर था। उस नगर में एक विशाल बरगद का पेड़ (वटवृक्ष) था। वृक्ष के ऊपर बहुत से पक्षी घोंसलों में रहते थे।
​एक बार एक शिकारी उस नगर में आया। उसने बरगद के पेड़ के नीचे जाल फैलाकर उसके ऊपर चावल के दाने बिखेर दिए, और स्वयं पास में ही छिपकर बैठ गया।
​इसके बाद चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा आकाश में उड़ रहा था। उसके साथ बहुत से कबूतर भी थे। जब उन्होंने धरती पर चावल के दाने देखे, तब वे उन्हें खाने के लिए नीचे आए। इस प्रकार वे सभी लालच के कारण जाल में फँस गए।
​चित्रग्रीव बहुत बुद्धिमान था। उसने शिकारी को देखकर कबूतरों से कहा—
​"तुम सब चिंताकुल (व्याकुल) मत हो, बल्कि इस जाल को लेकर साथ ही शीघ्रता से उड़ जाओ।"
​चित्रग्रीव के कहने के अनुसार सभी कबूतर जाल के साथ ही उड़ गए।
​चित्रग्रीव कबूतरों को वन के उस भाग में ले गया, जहाँ हिरण्यक नाम का चूहा रहता था। हिरण्यक उसका मित्र था। चित्रग्रीव के आदेश से सभी कबूतर वहाँ उतरे।
​चित्रग्रीव ने हिरण्यक को सारा वृत्तान्त (हाल) बताया और प्रार्थना की— "हे मित्र! इस जाल को काटकर मेरे परिवारजनों (साथियों) को बंधन से मुक्त करो।"
​चित्रग्रीव के आग्रह पर हिरण्यक ने शीघ्र ही उनका जाल काट दिया। इस प्रकार वे कबूतर जाल से स्वतंत्र हो गए और उन्होंने पुनः (नया) जीवन प्राप्त किया।
​सच ही कहा गया है—
​संघे शक्तिः, भेदे नाशः।
(संगठन/एकता में शक्ति होती है और फूट में नाश होता है।)

Monday, 20 July 2026

sanskrit Class 6 path 9 ahm vriksha asmi

मैं वृक्ष हूँ। पादप, तरु, वितप — ये सभी मेरे ही नाम हैं। मैं स्वयं धूप में खड़ा रहता हूँ और दूसरों को छाया प्रदान करता हूँ। मेरी शाखाओं में पक्षी घोंसले बनाते हैं। मेरे फल पशुओं के लिए आहार बनते हैं। मेरे फल, फूल, पत्ते, लकड़ी, जड़ें और छोटी-छोटी टहनियाँ — मेरा हर अंग दूसरों के हित के लिए होता है।
मैं वातावरण को शुद्ध करता हूँ। वर्षा के मौसम में भी मैं सहायक हूँ। मैं ही जल-प्रलय से धरती की रक्षा करता हूँ। मेरे बिना घरों, जंगलों और बगीचों की शोभा नहीं है। मूर्ख लोग छोटे-छोटे लाभ के लिए मुझे काटते हैं। इससे मुझे बहुत कष्ट होता है।
वृक्षों के जीवन से ही संसार का जीवन है। इसलिए हमारी रक्षा करना मानव का कर्तव्य है। हम तो दूसरों के कल्याण के लिए ही जीते हैं। कवि सत्य कहते हैं —
जो अपना सर्वस्व अर्पित करते हैं,
पराये हित के लिए ही,
वे वृक्ष सदैव जीवित रहें,
पृथ्वी पर सज्जनों की तरह॥

Class 8, पाठ 4: परिश्रमैव समृद्धेः मूलम्



एक समय की बात है, भगवान् विष्णु (हरि) ने स्वर्ग और नरक का निर्माण किया। उन्होंने इन्द्र को स्वर्ग का स्वामी बनाया और यमराज को नरक का स्वामी बनाया।

उस दिन से स्वर्ग में प्रतिदिन लोग आने लगे। लेकिन यमलोक (नरक) में किसी का भी आगमन नहीं होता था। इस कारण स्वर्ग जीवंत और आनंदमय हो गया, जबकि नरक निष्क्रिय और सुनसान पड़ा रहने लगा।

नरक की इस निष्क्रियता को देखकर यमराज चिंतित हो गए। वे अपना अधिकार छोड़ने के लिए भगवान् हरि के पास गए और प्रार्थना करने लगे — 

“भगवन्! मैं अपना अधिकार छोड़ना चाहता हूँ। कृपया मुझे इस भार से मुक्ति प्रदान करें।”

हरि ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा — “भगवान्! आप इस प्रकार क्यों चिंतित हैं? यह तो स्वाभाविक है। पृथ्वीलोक में लोग धार्मिक और नैतिक गुणों से सम्पन्न हैं, इसलिए वे स्वर्ग ही आते हैं।”

भगवान् हरि के ये वचन सुनकर यमराज संतुष्ट हो गए और चुप हो गए।

उसी समय भगवान् हरि के पास बैठी कमला (लक्ष्मी) ने उनसे प्रार्थना की — 

“भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के निवासियों को स्वर्ग प्राप्ति का रहस्य जानना चाहती हूँ। अतः आप और मैं वहाँ चलकर देखें।”

तब कमला हरि के साथ पृथ्वीलोक चली गईं। यमराज भी उनके साथ गए।

वहाँ उन्होंने देखा कि पृथ्वीलोक के सभी लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। उनका जीवन तपस्या के योग्य था। शहरों और गाँवों में मजदूर और किसान पूरी लगन से काम कर रहे थे। 

इन्हीं लोगों के परिश्रम से पृथ्वीलोक में सुख और समृद्धि सुशोभित हो रही थी। इसलिए अंत में वे सभी स्वर्गलोक को प्राप्त करते थे।

तब कमला ने कहा — “भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के लोगों को स्वयं यह वरदान देना चाहती हूँ।”

भगवान् हरि की आज्ञा से कमला पृथ्वीलोक में रहने लगीं।

तब से पृथ्वीवासी कमला के वैभव (धन-समृद्धि) के लोभ में पड़ गए। वे परिश्रम कम करने लगे। परिश्रम के त्याग से उनके सुख और समृद्धि नष्ट होने लगी, सदाचार समाप्त हो गया। वे भ्रष्टाचारी बन गए और अंत में नरक जाने लगे।

यह देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए और अपने लोक लौट आए।

तब भगवान् हरि ने कमला से कहा — 

“देवि! अब तुम्हें पृथ्वीलोक की सुख-समृद्धि का रहस्य ज्ञात हो गया।”

**परिश्रमैव समृद्धेः मूलम्।**  
**अर्थात् — परिश्रम ही समृद्धि का मूल है।**

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**मुख्य संदेश:**  
**मेहनत ही सफलता और समृद्धि की कुंजी है।** 

Class 8, पाठ 2 समयस्य सदुपयोग :

इस संसार में मानव जीवन दुर्लभ है। वहाँ (संसार में) मनुष्य जन्म लेकर भी मनुष्य समय का महत्त्व नहीं जानता। मानव जीवन में समय का बहुत महत्त्व है।

​संसार में अन्य नष्ट हुई वस्तुएँ पुनः प्राप्त की जा सकती हैं, परंतु बीता हुआ समय किसी भी उपाय से पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति की आयु का जो हिस्सा व्यर्थ चला गया, वह चला ही गया। अतः ऐसा प्रयत्न करना चाहिए जिससे एक क्षण का भी दुरुपयोग न हो, क्योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

​संसार में बहुत से लोग व्यर्थ में ही इधर-उधर घूमकर समय बिताते हैं। कुछ लोग तो आलस के कारण निरंतर बैठे ही रहते हैं। आलस के कारण वे अपने दैनिक कार्य भी नियम से नहीं करते। इसलिए वे रोगी हो जाते हैं। कुछ आलसी लोग तो खेलने में या सोने में ही अपना सारा समय बिता देते हैं और अपने जीवन के बहुमूल्य हिस्से को व्यर्थ गँवा देते हैं।
​समय का सदुपयोग जीवन की सफलता की पहली सीढ़ी, उन्नति का मूल मंत्र और आत्म-निर्माण का उत्तम साधन है। प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है कि किसी को भी समय का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। जो लोग कभी भी समय का दुरुपयोग नहीं करते और सदैव काम में लगे रहते हैं, वे सुख से रहते हैं। ऐसे कर्मवीर ही सब जगह श्रेष्ठ पद प्राप्त करते हैं।
​छात्रों के लिए तो समय का सदुपयोग ही उन्नति का साधन है। जो छात्र समय का सदुपयोग करके पढ़ाई करते हैं, वे अपने जीवन में सफल होते हैं। इस प्रकार समय का सदुपयोग मनुष्यों के कल्याण के लिए होता है।

Sunday, 12 July 2026

Bhikshuk


भिक्षुक
कवि - सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

 निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1. वह आता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर है एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को - भूख मिटाने को
मुँह फटी-पुरानी झोली को फैलता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता

प्रश्न – 1 ‘दो टूक कलेजे के करता’ - से कवि का क्या आशय है ?

उत्तर – हिंदी के निराले कवि ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ जी द्वारा रचित उपर्युक्त पंक्ति का आशय यह है कि एक भिक्षुक हृदय से दुखी होता हुआ पश्चताप करता हुआ सड़क पर आ रहा है, वह लोगों से कुछ खाने के लिए माँगता है परंतु उसे बदले में केवल अपमान और फटकार ही मिलती है। इसलिए उसका हृदय टूट जाता है।

प्रश्न – 2 ‘पेट-पीठ दोनों मिलकर है एक’ - पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए ?

उत्तर – ‘पेट-पीठ दोनों मिलकर है एक’ - पंक्ति का आशय यह है कि एक दुखी भिक्षुक काफी दिनों से भूखा है। उसे कुछ भी खाने के लिए प्राप्त नहीं हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उसका पेट और पीठ मिलकर एक हो गए है। लोगों से भीख माँगने पर भी उसे केवल अपमान और दुख ही प्राप्त होता है।

प्रश्न - 3 उपर्युक्त पंक्तियों के आधार पर भिक्षुक की दयनीय दशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर – उपरोक्त पंक्तियों में महाकवि ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ जी ने एक असहाय भिक्षुक की दयनीय दशा का चित्रण करते हुए कहा है कि वह हृदय से दुखी होता हुआ और अपने भाग्य पर पछताता हुआ लाठी के सहारे सड़क पर आ रहा है। वह कई दिनों से भूखा है जिस कारण उसका पेट और पीठ मिल गए हैं,परंतु उसकी दयनीय दशा का निवारण करने वाला कोई नहीं। वह मुट्ठी भर दाने पाने के लिए बड़ी उम्मीद से अपनी झोली फैला रहा है।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने लोगों की दयाहीनता की भावना को प्रदर्शित किया है। एक भिक्षुक जो कई दिनों से भूखा प्रतीत होता हैं और जिस कारण उसका पेट और पीठ एक हो गए हैं, लाठी के सहारे सड़क पर आ रहा है और झोली फैलाकर लोगों से मुट्ठी भर दाने की गुहार लगा रहा है लेकिन लोगों में दयाहीनता होने के कारण उसे भूखा रहना पड़ता है।


2. साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
 बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,
 और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाएं।
 भूख से सुख ओंठ जब जाते,
 दाता-भाग्य, विधाता से क्या पाते?
 घूँट आँसुओं का पीकर रह जाते।

प्रश्न – 1 भिक्षुक के साथ कौन है? वे क्या कर रहे हैं तथा क्यों? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – भिक्षुक के साथ दो बच्चे भी हैं। अपनी भूख प्रदर्शित करने के लिए और लोगों का ध्यान केंद्रित करने के लिए वे अपने बाएँ हाथ से अपना पेट मिल रहे हैं और दाहिने हाथ से लोगों से कुछ सहायता करने की प्रार्थना कर रहे हैं।

प्रश्न – 2 ‘दाता-भाग्य-विधाता’ ने कवि का संकेत किन की ओर है? कौन किन से क्या प्राप्त नहीं कर पाते ?

उत्तर – दाता-भाग्य विधाता से कवि का संकेत उन लोगों की ओर है जो उनको भोजन देने के लिए समर्थ हैं, परंतु दयाहीनता के अभाव में वे उन्हें असहाय छोड़ देते हैं। भिक्षुक के दोनों बच्चे आने वाले लोगों से कुछ भी खाने के लिए प्राप्त नहीं कर पाते।

प्रश्न – 3 ‘घूँट आँसुओं का पीकर रह जाते’ - मुहावरे का प्रयोग कवि ने किस संदर्भ में किया है? 

उत्तर – जब बच्चे और भिक्षुक लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, तब लोगों द्वारा कुछ न प्राप्त करने के कारण एवं भूखे रहने के कारण उनके होंठ सूख जाते हैं। वही अपमान और दुख के कारण वे आँसुओ का घूँट पीकर रह जाते हैं अर्थात अपना मन मसोसकर रह जाते हैं।

 प्रश्न – 4 भिक्षुक के बच्चों की दयनीय दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर – भिक्षुक के बच्चे अपने हाथ फैलाकर लोगों से भिक्षा माँग रहे हैं। बच्चे अपने बाएँ हाथ से अपना पेट मल रहे हैं और दाहिने हाथ से लोगों से कुछ दया, सहायता करने की प्रार्थना कर रहे हैं। वे इतने भूखे हैं कि उनके होंठ सूख चुके हैं। लोगों से अपमान और दुख के अतिरिक्त उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

3. चाट रहे जूठी पत्तल वे, कभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
 ठहरो, अहो। मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा।
 अभिमन्यु-जैसे हो सकोगे तुम,
 तुम्हारे दुख में मैं अपने हृदय को खींच लूँगा।

प्रश्न – 1 भिक्षुक तथा उसके बच्चे क्या करने के लिए विवश है और क्यों?

उत्तर – कई दिनों से भूखे रहने के कारण भिक्षुक तथा उसके बच्चे जूठी पत्तल चाटने को विवश हैं। अनेक प्रयासों व प्रार्थनाओं के बाद भी भिक्षुक व बच्चों को आसपास के लोगों से कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाता, इसलिए वे सड़क पर जूठी पत्तलों का बचा हुआ थोड़ा-सा भोजन चाट-चाटकर वे अपनी भूख मिटाने का प्रयत्न कर रहे हैं।

प्रश्न – 2 ‘और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए’ - पंक्ति द्वारा कवि क्या स्पष्ट करना चाहता है?

उत्तर – भिक्षुक व उसके बच्चे कई दिनों से भूखे हैं और किसी से भी कोई सहायता नहीं मिलने के कारण वे सड़क पर झूठी पत्तलों पर बचा-खुचा थोड़ा-सा भोजन चाट-चाट कर अपनी भूख मिटाने का प्रयत्न कर रहे हैं लेकिन उसके लिए भी उन्हें कुत्तों से संघर्ष करना पड़ रहा है। अतः निराला जी यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि भिक्षुक व उसके बच्चों की दशा पशुओं से भी हीन है।

प्रश्न – 3 भिक्षुक कविता में कवि ने समाज को किस बात के लिए फटकारा है?

उत्तर – भिक्षुक कविता में कवि ने समाज के समर्थ वर्ग के लोगों को फटकारा है जो समर्थ होते हुए भी भीख नहीं देते हैं और उन्हें अपमान करके भगा देते हैं। इसी दयाहीनता के कारण वह व्यक्ति भूखा मर जाता है। इसी बात के लिए निराला जी ने ऐसे दयाहीन समाज को फटकारा है।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने ‘अभिमन्यु’ शब्द का प्रयोग किस लिए किया है?

उत्तर – कवि ने ‘अभिमन्यु’ शब्द का प्रयोग भिक्षुक को प्रेरित करने के लिए किया है ताकि वे अभिमन्यु के समान संघर्ष कर सके। जिस प्रकार अभिमन्यु अकेले ही युद्ध में चक्रव्यूह भेदने के लिए गया था पर अंत में वह लौटते समय सात महारथियों के एक साथ प्रहार से मर गया था और मरने के बाद भी अपनी वीरता के कारण हमेशा के लिए अमर हो गया। इसी तरह की कल्पना कवि भिक्षुक के लिए भी करते हैं।

Wednesday, 8 July 2026

Hindi Ch 6 सम्मान

 प्रस्तुत पंक्तियों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखकर लिखिए - 

1. “क्या मैं अछूत हूँ जो आप मेरे साथ खाना नहीं खाती?”
प्र०-1 प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता व श्रोता कौन हैं?
उत्तर : प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता निभा व 
श्रोता उसकी साथ की लड़कियाँ हैं।
प्र०-२ लड़कियों ने निभा की बात का क्या जवाब दिया?
उत्तर :  लड़कियों ने निभा को जवाब देते हुए कहा कि हमें गँवारों के साथ खाना अच्छा नहीं लगता।
प्र०- 3 निभा कैसी लड़की थी?
उत्तर : निभा एक सकारात्मक विचारों वाली प्रतिभाशाली व बुद्धिमान लड़की थी।


2. “तुमने अपने परिवार _ _ _ _ _ _ _प्रदेश का गौरव बढ़ाया है।”

प्र०-1 प्रस्तुत पंक्तियां किसने, किससे कही है?
उत्तर प्रस्तुत पंक्तियाँ जिलाधिकारी साहब ने निभा से कही है।

प्र०-२ जिलाधिकारी साहब ने ऐसा क्यों कहा?
उत्तर : निभा ने कला संगीत व पढ़ाई में पूरे प्रदेश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। इसी कारण जिलाधिकारी साहब ने निभा को बधाई देते हुए ऐसा कहा।

प्र०-३ जिलाधिकारी साहब निभा के घर क्यों गए थे?
उत्तर : जिलाधिकारी साहब निभा के घर उसे बधाई देने तथा राज्यपाल के द्वारा दिए जाने वाला सम्मान का आमंत्रण पत्र देने गए थे।

कक्षा 7 : संस्कृत : पाठ 2 : नीतिश्लोक

कक्षा 7
पाठ 3 नीति- श्लोक 

​1. पहला श्लोक
​श्लोक: विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मः ततः सुखम्।।
​सरल अनुवाद: विद्या (ज्ञान) हमें विनम्रता देती है। विनम्रता से इंसान में योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता होने से धन की प्राप्ति होती है, धन से इंसान धर्म के कार्य (अच्छे काम) करता है और अंत में उसे सुख मिलता है।
​सीख: अगर हम अच्छे से पढ़ाई करेंगे, तो हमारे जीवन में सुख-शांति अपने आप आ जाएगी।

​2. दूसरा श्लोक
​श्लोक: आचारः प्रथमो धर्मः, आचारः परमं तपः।
आचारः परमं ज्ञानम्, आचारात् किं न सिध्यति।।
​सरल अनुवाद: अच्छा आचरण (अच्छा व्यवहार या संस्कार) ही सबसे पहला धर्म है। अच्छा आचरण ही सबसे बड़ी तपस्या है और अच्छा आचरण ही सबसे बड़ा ज्ञान है। अच्छे आचरण से दुनिया में ऐसा क्या है जो हासिल नहीं किया जा सकता? (अर्थात, अच्छे व्यवहार से सब कुछ मिल सकता है)।
​सीख: हमें हमेशा सबके साथ तमीज और अच्छे संस्कार से पेश आना चाहिए।

​3. तीसरा श्लोक
​श्लोक: प्रिय-वाक्य-प्रदानेन, सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं, वचने का दरिद्रता।।
​सरल अनुवाद: मीठे और प्यारे वचन (बोल) बोलने से सभी जीव-जंतु और इंसान खुश हो जाते हैं। इसलिए हमें हमेशा मीठी वाणी ही बोलनी चाहिए। भला अच्छे और मीठे बोल बोलने में कैसी कंजूसी (दरिद्रता)?
​सीख: हमेशा सबसे प्यार से बात करनी चाहिए, क्योंकि मीठा बोलने में कोई पैसे नहीं लगते!

​4. चौथा श्लोक
​श्लोक: छायामन्यस्य कुर्वन्ति, स्वयं तिष्ठन्ति आतपे।
फलान्यपि परार्थाय, वृक्षाः सत्पुरुषाः इव।।
​सरल अनुवाद: पेड़ खुद तो कड़ी धूप में खड़े रहते हैं, लेकिन दूसरों को ठंडी छाया देते हैं। उनके फल भी दूसरों के भले के लिए (खाने के लिए) ही होते हैं। सचमुच, पेड़ सज्जन (अच्छे) लोगों की तरह होते हैं, जो हमेशा दूसरों की मदद करते हैं।
​सीख: हमें भी पेड़ों की तरह परोपकारी बनना चाहिए और दूसरों की मदद करनी चाहिए।

​5. पांचवां श्लोक
​श्लोक: प्राणान् त्यजति देशाय, पीडितानां सहायकः।
यः आचरति कल्याणं, लोके मानं सः विन्दति।।
​सरल अनुवाद: जो इंसान अपने देश के लिए अपने प्राण तक दे देता है, जो दुखियों और पीड़ितों की मदद करता है और जो हमेशा सबका भला (कल्याण) करता है—वही इंसान इस संसार में सच्चा सम्मान और आदर पाता है।
​सीख: देशप्रेम और दूसरों की सेवा करने वाले इंसान को दुनिया हमेशा याद रखती है।

​6. छठा श्लोक
​श्लोक: जाड्यं धियो हरति, सिञ्चति वाचि सत्यम्,
मानोन्नतिं दिशति, पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति, दिक्षु तनोति कीर्तिम्,
सत्सङ्गतिः कथय, किं न करोति पुंसाम्।।

​सरल अनुवाद: अच्छी संगति (सत्सङ्गति) इंसान के लिए क्या-क्या नहीं करती?
​यह बुद्धि की मूर्खता को दूर करती है।
​हमारी वाणी (बोली) में सच्चाई भरती है।
​समाज में मान-सम्मान बढ़ाती है।
​हमें पाप और गलत कामों से बचाती है।
​हमारे मन को खुश रखती है।
​चारों दिशाओं में हमारा यश (नाम) फैलाती है।
सच कहो, अच्छे दोस्तों की संगति इंसान का हर तरह से भला करती है!
​सीख: हमें हमेशा अच्छे और संस्कारी बच्चों को ही अपना दोस्त बनाना चाहिए।

Class 7 : संस्कृत : पाठ 6 : ऋषिकेश

कक्षा 7 - पाठ 6
ऋषिकेश 

हमारे देश का नाम भारतवर्ष है, जो बहुत ही सुंदर और विशाल (भव्य) है। इस देश में सब जगह प्राकृतिक सुंदरता दिखाई देती है। भारत के विशाल और सुंदर स्थानों में 'ऋषिकेश' भी एक देखने योग्य (दर्शनीय) स्थान है।
ऋषिकेश, गंगा के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल 'हरिद्वार' से 19 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ों से घिरा हुआ है। यहाँ गंगा अपनी प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है। गंगा और पहाड़ों की हरियाली से घिरा हुआ ऋषिकेश एक बहुत ही सुंदर और पवित्र तीर्थ स्थल है।
साधु और महात्मा लोग इस स्थान पर अपनी आत्मा और परमात्मा का ध्यान करते हैं। इसके अलावा, कवि और लेखक भी यहाँ की कोमल कल्पनाओं में डूबकर अपनी कलम से सुंदर काव्यों की रचना करते हैं।
वैज्ञानिक रूप से भी ऋषिकेश का बहुत महत्व है। यहाँ स्थित पर्वत श्रृंखलाओं (पहाड़ों) में कई प्रकार की औषधियाँ (जड़ी-बूटियाँ) भी पैदा होती हैं। आयुर्वेद के आचार्य (डॉक्टर) उनका उपयोग भयानक बीमारियों को ठीक करने के लिए करते हैं।
ऋषिकेश के देखने योग्य स्थानों में 'लक्ष्मण झूला' सबसे पहला (प्रमुख) है। यह एक ऐसा पुल है जिसका निर्माण गंगा नदी को पार करने के लिए किया गया था। जब इस पुल पर लोग चलते हैं, तब यह हिलता (कंपित होता) है। यहाँ 'गरुड़ चट्टी' भी एक दर्शनीय स्थल है।
इस स्थान से थोड़ी ही दूरी पर 'गीता भवन' नाम का प्रसिद्ध आश्रम है। महर्षि कण्व का आश्रम भी इसी स्थान पर था। राजा भरत की माता शकुंतला का पालन-पोषण भी इसी आश्रम में हुआ था। नगरों के शोर-शराबे (कोलाहल) से दूर यह स्थान वास्तव में आत्म-उन्नति (आध्यात्मिक विकास) का स्थान है।

Monday, 6 July 2026

ch 8 Sanskrit class 6


लंबे समय की गुलामी (परतंत्रता) के कष्ट को सहकर हमारा देश भारत वर्ष 1947 में अगस्त महीने की पंद्रह तारीख को अंग्रेजों के शासन से स्वतंत्र हुआ। तब भारत का नवीन संविधान वर्ष 1950 में जनवरी महीने की छब्बीस तारीख से लागू (प्रचलित) हुआ। इसलिए, गणतंत्र शासन की शुरुआत होने के कारण इस दिन को **'गणतंत्र दिवस'** कहा जाता है। अतः हम हर वर्ष इस दिन महान उत्सव (महोत्सव) मनाते हैं।
इस दिन सब जगह अवकाश (छुट्टी) होती है। भारत के सभी शहरों और गाँवों में गणतंत्र दिवस का भव्य (महान) समारोह होता है। सभी लोग अपने-अपने शहरों और गाँवों में बड़े उत्साह और उल्लास के साथ गणतंत्र दिवस का आयोजन करते हैं। परंतु देश की राजधानी दिल्ली तो इस अवसर पर विशेष रूप से सजी होती है।
भारत की राजधानी दिल्ली नगरी में सभी प्रदेशों (राज्यों) से लोग समारोह देखने आते हैं। सुबह से ही लाखों लोग 'भारत द्वार' (**इंडिया गेट**) पर एकत्रित होते हैं। तब राष्ट्रपति अपने विशेष वाहन से अंगरक्षकों के साथ विजय चौक (विजय-चतुष्पथ) पर आते हैं। तोपों की गर्जना (सलामी) से राष्ट्रपति का अभिनंदन किया जाता है। इसके बाद जल सेना, थल सेना और वायु सेना के सैनिक राष्ट्रपति का अभिवादन करते हैं। इसके बाद हवाई जहाज (वायुयान) आकाश से फूलों की वर्षा करते हैं।
लाखों लोग यह सब देखकर तालियाँ बजाते हैं और राष्ट्र की सेवा के लिए प्रतिज्ञा करते हैं। वास्तव में, गणतंत्र दिवस भारत के लिए महान गौरव प्रदान करने वाला है।

Class 8, पाठ 1 प्रभातवेला

पाठ - 1 प्रभातवेला  ​रात बीत जाने पर प्रभात (सुबह) का समय आता है। प्रातःकाल की सुंदरता अत्यंत रमणीय (सुंदर) होती है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त...