Thursday, 20 August 2026

Clas 8 Ch 8, मन भावन सावन कविता

पाठ - 6 
मन भवान सावन 

पुस्तक से कविता के शब्द अर्थ करें।
• नीचे दिए गई पंक्तियों को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:-

झम-झम_ _ _ _ _ _ _ घन के।
प्रश्न 1 : बिजली कैसे और किसके उर में चमकती है?
उत्तर : जब आसमान में घनघोर बादल छाए रहते हैं, तब बिजली तेज आवाज के साथ आसमान में गरजती है। ऐसा लगता है मानो बादलों को चीरती हुई पृथ्वी पर आ गिरी हो और तेज़ गड़गड़ाहट की आवाज करती है।

प्रश्न 2 : कविता में कवि ने किस ऋतु का वर्णन किया है?
उत्तर : कविता में कवि ने वर्षा ऋतु में आने वाले सावन के महीने का वर्णन किया है।

प्रश्न 3 : सावन के मेघ कैसे बरसते हैं?
उत्तर : सावन के मेघ झम-झम बरसते हैं और उनकी छन-छम करती बूंदें पेड़ों की शाखाओं से छन-छन कर गिरती हैं।

प्रश्न 4 : कविता व उसके रचयिता का नाम बताइए।
उत्तर : कविता का नाम 'मन भावन सावन' है तथा रचयिता का नाम 'सुमित्रानंदन पंत जी' है।

प्रश्न 5 : तरुओं, उर, तम शब्दों के अर्थ बताइए।
उत्तर : वृक्षों, हृदय, अंधकार।

 2. नाच रहे पागल हो _ _ _ _ _ _ _ गर्जन
प्र०1 : सावन में मेघ किस प्रकार की ध्वनि करते हुए बरसते हैं?
उ०1 : सावन में मेघ झम-झम की ध्वनि करते हुए बरसते हैं।

प्र०2 : पीपल और नीम अपनी प्रसन्नता किस प्रकार प्रकट करते हैं?
उ०2 : दोनों पीपल और नीम झूम-झूमकर आनंदित हो रहे हैं और दोनों खुशी के साथ नाच रहे हैं।

प्र०3 : कवि ने सावन के गीत किस झूले में बैठकर गाने की इच्छा प्रकट की  है?
उ०3 : कवि ने सावन के गीत इंद्रधनुष के झूले में बैठकर गाने की इच्छा प्रकट की है।

प्र०4 : सावन में प्रकृति की शोभा का वर्णन कीजिए:-
उ०4 : सावन ऋतु में प्रकृति अत्यधिक सुन्दर दिखाई देती है। चारों ओर प्रसन्नता व हरियाली छाई रहती है भ्रमर व मयूर प्रसन्न होकर गुंजार व नृत्य करने लगते हैं। वृक्षों की शाखाओं पर झूले डल जाते हैं और सभी जगह फूलों की सुगंध से वातावरण सुगंधित हो उठता है।

प्र० 5 : इस कविता से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उ० 5 : इस कविता से हमें प्रेरणा मिलती है कि प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आचरण और व्यवहार द्वारा जन-जन के जीवन में सावन का उल्लास भरने का प्रयास करें।


Wednesday, 12 August 2026

Class 8 संस्कृत पाठ 5 : दिल्ली नगरम

दिल्ली नगर भारतवर्ष की राजधानी है। यह नगर अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक है। इसका पुराना नाम 'इंद्रप्रस्थ' था। भारत के केंद्र में स्थित होने के कारण यह नगर अति प्राचीन काल से देश की राजधानी होने का गौरव वहन कर रहा है। आज भी यह स्वतंत्र भारत की राजधानी है। केंद्र सरकार के सर्वोच्च अधिकारी और विदेशों के प्रतिनिधि यहीं निवास करते हैं।
दिल्ली नगर में भारत के विभिन्न प्रदेशों के निवासी आसानी से देखे जा सकते हैं। दूर-दूर से आकर लोग यहाँ प्राचीन और नवीन अनेक दर्शनीय स्थलों को देखकर अपना मनोरंजन करते हैं।
दिल्ली नगर का प्राचीन भाग 'पुराणी दिल्ली' नाम से जाना जाता है, और वहाँ 'चांदनी चौक', 'लाल किला', 'जामा मस्जिद', 'यमुना पुल' तथा 'राजघाट' नाम के दर्शनीय स्थान हैं। पुरानी दिल्ली भाग के भवन प्राचीन शैली में निर्मित हैं। वहाँ भारत की संस्कृति और कला झलकती है। दिल्ली नगर का नया भाग 'नई दिल्ली' नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ चिड़ियाघर, बिड़ला मंदिर, जंतर-मंतर और कुतुब मीनार प्रसिद्ध स्थान हैं। जब दिल्ली नगर में 'एशियाड 82' (1982 के एशियाई खेल) का आयोजन हुआ था, उसी आयोजन से इस नगर की शोभा अत्यंत बढ़ गई थी।
यहाँ नेहरू स्टेडियम, नेशनल स्टेडियम और इंदिरा गांधी (इंद्रप्रस्थ) स्टेडियम आदि विभिन्न विशाल खेल के मैदान भली-भांति निर्मित हैं। ऊँचे फ्लाईओवर (पारगमन पथ) सुंदर प्रतीत होते हैं। नई दिल्ली नगर में मार्ग अत्यंत चौड़े, सुव्यवस्थित और स्वच्छ हैं। रात में यहाँ विभिन्न प्रकार की बत्तियों (लाइटों) का प्रकाश बहुत सुशोभित होता है। यहाँ अनेक प्रकार के वाहनों का बहुत बड़ा आवागमन रहता है। पालम में स्थित हवाई अड्डा अत्यंत दर्शनीय है।
दिल्ली नगर व्यापार और उद्योगों का भी केंद्र है। यह संपूर्ण संसार की राजनीतिक गतिविधियों का भी केंद्र है। अतः यह नगर अत्यंत समृद्ध, वैभवशाली और सुंदर है।

Class 8, पाठ 4: परिश्रमैव समृद्धेः मूलम्



एक समय की बात है, भगवान् विष्णु (हरि) ने स्वर्ग और नरक का निर्माण किया। उन्होंने इन्द्र को स्वर्ग का स्वामी बनाया और यमराज को नरक का स्वामी बनाया।

उस दिन से स्वर्ग में प्रतिदिन लोग आने लगे। लेकिन यमलोक (नरक) में किसी का भी आगमन नहीं होता था। इस कारण स्वर्ग जीवंत और आनंदमय हो गया, जबकि नरक निष्क्रिय और सुनसान पड़ा रहने लगा।

नरक की इस निष्क्रियता को देखकर यमराज चिंतित हो गए। वे अपना अधिकार छोड़ने के लिए भगवान् हरि के पास गए और प्रार्थना करने लगे — 

“भगवन्! मैं अपना अधिकार छोड़ना चाहता हूँ। कृपया मुझे इस भार से मुक्ति प्रदान करें।”

हरि ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा — “भगवान्! आप इस प्रकार क्यों चिंतित हैं? यह तो स्वाभाविक है। पृथ्वीलोक में लोग धार्मिक और नैतिक गुणों से सम्पन्न हैं, इसलिए वे स्वर्ग ही आते हैं।”

भगवान् हरि के ये वचन सुनकर यमराज संतुष्ट हो गए और चुप हो गए।

उसी समय भगवान् हरि के पास बैठी कमला (लक्ष्मी) ने उनसे प्रार्थना की — 

“भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के निवासियों को स्वर्ग प्राप्ति का रहस्य जानना चाहती हूँ। अतः आप और मैं वहाँ चलकर देखें।”

तब कमला हरि के साथ पृथ्वीलोक चली गईं। यमराज भी उनके साथ गए।

वहाँ उन्होंने देखा कि पृथ्वीलोक के सभी लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। उनका जीवन तपस्या के योग्य था। शहरों और गाँवों में मजदूर और किसान पूरी लगन से काम कर रहे थे। 

इन्हीं लोगों के परिश्रम से पृथ्वीलोक में सुख और समृद्धि सुशोभित हो रही थी। इसलिए अंत में वे सभी स्वर्गलोक को प्राप्त करते थे।

तब कमला ने कहा — “भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के लोगों को स्वयं यह वरदान देना चाहती हूँ।”

भगवान् हरि की आज्ञा से कमला पृथ्वीलोक में रहने लगीं।

तब से पृथ्वीवासी कमला के वैभव (धन-समृद्धि) के लोभ में पड़ गए। वे परिश्रम कम करने लगे। परिश्रम के त्याग से उनके सुख और समृद्धि नष्ट होने लगी, सदाचार समाप्त हो गया। वे भ्रष्टाचारी बन गए और अंत में नरक जाने लगे।

यह देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए और अपने लोक लौट आए।

तब भगवान् हरि ने कमला से कहा — 

“देवि! अब तुम्हें पृथ्वीलोक की सुख-समृद्धि का रहस्य ज्ञात हो गया 
 — परिश्रम ही समृद्धि का मूल है।**


Thursday, 30 July 2026

चलना हमारा काम है


चलना हमारा काम है 
कवि – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

 निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए – 

1. गति प्रबल पैरों में भरी,
  फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा,
  जब आज मेरे सामने 
  है रास्ता इतना पड़ा।
  जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है।
  चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1 ‘गति प्रबल पैरों में भरी’ – पंक्ति द्वारा कवि मनुष्य को क्या संदेश दे रहा है?
उत्तर – इस पंक्ति द्वारा कवि मनुष्य को यह संदेश दे रहे हैं कि मनुष्य को जीवन पथ पर अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निरंतर सक्रिय और गतिशील रहना चाहिए।

प्रश्न – 2 मनुष्य कवि को दर-दर पर खड़ा न होने की प्रेरणा क्यों दे रहा है?
उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि मनुष्य को यह प्रेरणा देना चाहते हैं कि जब मनुष्य में इतनी शक्ति और सामर्थ्य है कि वह जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकता है तो उसे फिर दर-दर भटकने या खड़े होने की क्या आवश्यकता है। जब उसके पैरों में अद्भुत गति एवं शक्ति विद्यमान हैं तो उसे जगह-जगह रुकना नहीं चाहिए। उसे लगातार चलते रहना चाहिए अर्थात् जब तक उसके मंजिल उसे नए मिल जाए, तब तक सतत प्रयास करते रहना चाहिए और दर-दर खड़ा होने के बजाय चुनौतियों का सामना करते हुए अपने लक्ष्य प्राप्ति की ओर बढ़ते रहना चाहिए।

प्रश्न – 3 ‘जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है’ पंक्ति द्वारा कवि क्या स्पष्ट करना चाहता है?
उत्तर – इस पंक्ति के द्वारा कवि यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि जब तक मनुष्य अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच जाता तब तक वह विश्राम नहीं करेगा और चलता रहेगा और अपनी मंजिल पाने के लिए निरंतर प्रयास करता रहेगा।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों में कवि मनुष्य को प्रेरणा दे रहा है कि उसे जीवन में निरंतर सक्रिय और गतिशील रहना चाहिए। मनुष्य को दर-दर खड़ा होने के बजाय निरंतर चुनौतियों का सामना करना चाहिए। कवि अभी अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच पाया है। अभी उसके सामने लंबा रास्ता पड़ा है, जब तक वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक वह विश्राम नहीं कर सकता।

2. कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया 
 कुछ बोल अपना बँट गया,
 अच्छा हुआ तुम मिल गईं 
 कुछ रास्ता ही कट गया।
 क्या राम में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है।
 चलना हमारा काम है। 

प्रश्न – 1 ‘कुछ बोझ अपना बँट गया’ - कवि ने यह कहने का क्या भाव है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्ति के माध्यम से कवि कहना चाहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहते हुए वह बहुत लोगों से मिलता है। अपने जीवन पथ पर चलते हुए वह जिन लोगों से मिलता है उनसे अपना सुख दुख कहता है और कुछ दूसरों की सुनता है। ऐसा करने से उसके मन का बोझ हल्का हो जाता है और प्रेम व स्नेह की वृद्धि भी होती है। अर्थात् जब एक दूसरे से मन की बातें कह दी जाती हैं तब मन में शांति की अनुभूति होती है और मनुष्य आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होता है।

प्रश्न – 2 ‘अच्छा हुआ तुम मिल गई’- कवि को कौन, कहाँ मिल गई? उसके मिलने से उसे क्या लाभ हुआ? 
उत्तर – इस पंक्ति में कवि को उसकी प्रेमिका जीवन के मार्ग पर चलते हुए मिल गई। उसके मिलने से उसे यह लाभ हुआ कि उसके जीवन का कुछ समय आसानी से बीत गया और रास्ता आसानी से कट गया।

प्रश्न – 3 कवि अपना परिचय किस रूप में देता है और क्यों?
उत्तर –  कवि ने जीवन पथ पर चलते हुए अपना परिचय एक पथिक के रूप में दिया है। उनका कहना है कि राह पर चलते हुए वह एकमात्र पथिक है, जिसका काम चलते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति करना है। जिस प्रकार रास्ते में चलने वाला हर व्यक्ति केवल राही (पथिक) होता है और अपने गंतव्य की ओर बढ़ता जाता है। उसी प्रकार वह भी जीवन में निरंतर उन्नति के पथ पर चलते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त करना चाहते हैं। 

3. जीवन अपूर्ण लिए हुए 
 पाता कभी, खोता कभी 
 आशा-निराशा से घिरा 
  हँसता कभी, रोता कभी।
  गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है।
  चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1 कवि ने जीवन को अपूर्ण क्यों कहा है?
उत्तर – कवि का कहना है कि मनुष्य का जीवन अपूर्ण होता है क्योंकि उसके जीवन में सफलता के साथ असफलता, सुख के साथ दुख और सहजता के साथ बाधाएं आती रहती है। यही जीवन है। अर्थात् मनुष्य का जीवन अपूर्ण होता है। जीवन के दो पहलू होते हैं जिसमें आशा-निराशा, सुख-दुख दोनों ही होते हैं और इनका क्रम बना रहता है। समय परिवर्तनशील होता है। अतः मनुष्य के जीवन में भी सदैव एक जैसी स्थिति नहीं रहती है, जिससे उसके जीवन में अपूर्णता बनी रहती है।

प्रश्न – 2 उपर्युक्त पंक्तियों में जीवन की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों में जीवन में आने वाली सफलता-असफलता, सुख-दुख एवं आशा-निराशा की ओर संकेत किया गया है। यही जीवन की विशेषताएँ हैं।

प्रश्न – 3 ‘गति-मति न हो अवरुद्ध’ - पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – इस पंक्ति का यह आशय है कि हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों के कारण हमारी गति कभी नहीं रुक सकती क्योंकि गति ही जीवन है। अतः हमें अपने लक्ष्य की ओर निरंतर गतिशील बने रहना चाहिए।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कवि मनुष्य को क्या प्रेरणा दे रहा है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों के माध्यम से कवि ने मनुष्य को यह प्रेरणा दी है कि सुख-दुख, सफलता-असफलता आदि के कारण मनुष्य की गति रुकनी नहीं चाहिए तथा उसे निरंतर जीवन पथ पर गतिशील बने रहना चाहिए क्योंकि जीवन में कोई स्थिति सदा के लिए नहीं रहती।

4. इस विशद विश्व-प्रवाह में 
 किसको नहीं बहाना पड़ा 
 सुख – दुख हमारी ही तरह 
 किसको नहीं सहना पड़ा।
 फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है।
 चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने मानव-जीवन की किस सच्चाई को उजागर किया है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्ति के माध्यम से कवि ने मानव जीवन की इस सच्चाई को उजागर किया है कि मानव जीवन में सभी को सुख-दुख, आशा-निराशा तथा असफलता-सफलता से प्रभावित होना अनिवार्य है।

प्रश्न – 2 ‘फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है’- पंक्ति द्वारा कवि क्या संकेत कर रहा है तथा क्यों?
उत्तर – इस पंक्ति द्वारा कवि यह संकेत कर रहा है कि संसार में ऐसे लोग हैं जो भाग्यवादी है तथा दुख या असफलता का सामना होने पर यह तक कहा करते है कि मेरा भाग्य खराब है।

प्रश्न – 3 उपर्युक्त पंक्तियों में भाग्य पर रोने को मनुष्य के किस दुर्बलता के निशानी बताया गया है?
उत्तर – इस पंक्ति में भाग्य पर रोने को मनुष्य में धैर्य और साहस न होने की दुर्बलता की निशानी को बताया गया है।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कवि क्या संदेश दे रहा है?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्ति में कवि है यह संदेश दे रहा है कि जीवन पथ की बाधाओं पर विजय प्राप्त करते हुए धैर्य और साहस से आगे बढ़ते रहना चाहिए।

5. मै पूर्णता की खोज में 
दर-दर भटकता ही रहा 
प्रत्येक पग पर कुछ-न-कुछ 
रोड़ा अटकता ही रहा 
पर हो निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है।
चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1 ‘ मैं पूर्णता की खोज में, दर-दर भटकता ही रहा’- पंक्ति द्वारा कवि का क्या आशय है?
उत्तर – ‘मैं पूर्णता की खोज में, दर-दर भटकता ही रहा’ पंक्ति में कवि कहता है कि मनुष्य का जीवन अपूर्ण होता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में गुण और अवगुण दोनों का समावेश होना निश्चित है, वैसे ही सुख-दुख, सफलता-असफलता भी जीवन के दो पहलू हैं। कवि कहता है कि मनुष्य संपूर्ण मानव बनना चाहता है और यही कारण है कि वह दरवाजे-दरवाजे पर भटकता रहता ह। वास्तव में मानव का जीवन सुख-दुख, आशा-निराशा, सफलता-असफलता आदि से भरा है। अतः मनुष्य को इसे सहजता से स्वीकार कर जीवन पथ पर निरंतर कर्म करते रहने चाहिए।

प्रश्न – 2 ‘प्रत्येक पग पर कुछ-न-कुछ रोड़ा अटकता ही रहा’- पंक्ति द्वारा मानव-जीवन की किस सच्चाई को उजागर किया गया है?
उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि मानव जीवन कि इस सच्चाई को उजागर करते हैं कि मानव जीवन में दुख, निराशा और असफलता आते जाते रहते हैं।

प्रश्न – 3 ‘जीवन इसी का नाम है’- पंक्ति द्वारा कवि ने मानव जीवन के संबंध में क्या कहा है?
उत्तर – इस पंक्ति द्वारा कवि ने मानव जीवन के संबंध में यह कहा है कि जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए हमें अनेक प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि वह स्वाभाविक है।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों के द्वारा स्पष्ट कीजिए कि जीवन में आने वाली बाधाओं का सामना हमें किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा जीवन में आने वाली बाधाओं का सामना हमें निरंतर गतिशील, विनयशील एवं कर्तव्यनिष्ठ होकर करना चाहिए क्योंकि यही मानव का कर्तव्य है।

6. कुछ साथ में चलते रहे 
 कुछ बीच ही से फिर गए।
 पर गति न जीवन की रुकी 
 जो गिर गए सो गिर गए 
 चलता रहे हरदम, उसी की सफलता अभिराम है।
 चलना हमारा काम है।

प्रश्न – 1 ‘कुछ साथ में चलते रहे, कुछ बीच से ही फिर गए’- पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर – इस पंक्ति में कवि यह कहना चाहता हैं कि मनुष्य को जीवन पथ पर बढ़ते हुए अनेक साथी मिलते है, जिसमें से कुछ बीच में उसका साथ छोड़ देते हैं, तो कुछ निराश होकर लौट जाते हैं। परंतु ऐसा होने पर भी उसके जीवन की गति नही रुकती । वह निरंतर रूप से जीवन पथ पर अग्रसर होता रहता है ।

प्रश्न – 2 ‘चलना हमारा काम है’- कविता में भाग्यवाद पर किस प्रकार चोट की गई है?
उत्तर – इस कविता में भाग्यवाद पर इस प्रकार चोट की गई है कि दुख या असफलता का सामना होने पर लोग कहते हैं कि उनका भाग्य खराब है।कवि के अनुसार ऐसे लोग नहीं जानते कि सुख और दुख दोनों जीवन के अनिवार्य अंग है। इसलिए कवि के अनुसार दुख से विचलित होकर भाग्य को दोष देना उचित नहीं होता है 

प्रश्न – 3 कवि के अनुसार जीवन में सफलता कैसे मिलती है?
उत्तर – कवि के अनुसार जीवन में सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है जो संकट और दुखों तथा निराशा का सामना करके दृढ़ता से खड़ा रहे और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता रहे।

प्रश्न – 4 कवि ने कविता में ‘चलना हमारा काम है’- पंक्ति को बार-बार क्यों दोहराया गया है? कवि इससे क्या प्रेरणा दे रहा है?
उत्तर – कवि कविता में ‘चलना हमारा काम है’ पंक्ति को बार-बार दोहराकर संदेश देना चाहते हैं कि मनुष्य को हमेशा प्रयत्नशील, गतिशील रहना चाहिए तभी हमारा जन्म सार्थक होगा क्योंकि कर्मशील व्यक्ति मरकर भी अमर होते है। अर्थात् आशा-निराशा, सुख-दुख, असफलता और किसी भी विषम परिस्थिति में हमें अपने लक्ष्य को नहीं भूलना चाहिए और निरंतर अपने लक्ष्य प्राप्ति के पथ पर चलते रहना चाहिए।


Thursday, 23 July 2026

Class 8, पाठ 1 प्रभातवेला

पाठ - 1
प्रभातवेला 


​रात बीत जाने पर प्रभात (सुबह) का समय आता है। प्रातःकाल की सुंदरता अत्यंत रमणीय (सुंदर) होती है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त के समय सुबह चार बजे से शुरू होता है और सूर्योदय तक का समय प्रभातवेला (सुबह का समय) ही कहा जाता है। यह समय चौबीसों घंटों में सबसे श्रेष्ठ और सर्वोत्तम होता है।
​प्रभातकाल में प्रकृति की शोभा भी अत्यंत मनमोहक होती है। एक ओर सूर्योदय के समय सूर्य का लाल बिंब (गोला) मन को हर लेता है, तो दूसरी ओर सोकर उठे हुए पक्षी अपनी मधुर चहचहाहट से शांत भूमंडल को संगीत से भर देते हैं। वनों में, बगीचों में, नदी के तटों पर और खेतों में ठंडी, मंद और सुगंधित हवा बहती है। सुबह के समय शुद्ध वायु में घूमने से स्वास्थ्य बढ़ता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष, स्त्रियां और बच्चे सुबह टहलने के लिए जाते हैं, और युवा व्यायाम करते हैं तथा शक्ति और स्वास्थ्य प्राप्त करते हैं।
​प्रातःकाल वृक्षों की हरी-भरी शोभा और फूलों की सुगंध टहलने वाले लोगों के नेत्रों और मन को प्रसन्न करती है। ब्रह्ममुहूर्त में अध्ययनशील (पढ़ने वाले) विद्यार्थी उठकर विद्या प्राप्त करते हैं। वे पढ़े हुए पाठों का अभ्यास करते हैं और कई विषयों को कंठस्थ (याद) करते हैं।
​इस प्रकार प्रभातवेला में प्रसन्न हुए सभी लोग अपने-अपने कार्यों में लगे हुए दिखाई देते हैं। ऑक्सीजन युक्त वायु से शक्ति प्राप्त करके लोग शाम तक स्वस्थ मन और शरीर से काम करते हैं और थकान का अनुभव नहीं करते हैं।
​इसलिए, हमें भी हमेशा सूर्योदय से पहले ही उठकर उद्यानों (बगीचों) आदि में नियमानुसार/समय पर घूमकर घर वापस आना चाहिए। इसके बाद स्नान करके पढ़ाई में और अपने अन्य दैनिक कार्यों में लग जाना चाहिए।

Class 8, पाठ 3 : नीतिवाचनानि

संस्कृत:
अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशोबलम् ॥ १ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो व्यक्ति अभिवादन (नमस्कार) करने वाला और प्रतिदिन बड़ों (वृद्धों) की सेवा करने वाला होता है, उसके चार चीजें बढ़ती हैं — आयु, विद्या, यश और बल।
2.
संस्कृत:
प्रियवाक्य-प्रवदनेन, सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात्तदेव वक्तव्यम्, वचने का दरिद्रता ॥ २ ॥
हिंदी अनुवाद:
प्रिय वचन (मीठी बात) बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए वही बोलना चाहिए। बातों में दरिद्रता (कंजूसी) क्या है?
3.
संस्कृत:
मनसा चिन्तितं कार्यं, वाचा नैव प्रकाशयेत् ।
मनवद् रहस्यं गूढं, कार्यं चापि नियोजयेत् ॥ ३ ॥
हिंदी अनुवाद:
मन में सोचा हुआ काम वाणी (मुँह) से प्रकट नहीं करना चाहिए। मन की तरह रहस्य को गुप्त रखना चाहिए और कार्य को भी गुप्त रूप से पूरा करना चाहिए।
4.
संस्कृत:
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ ४ ॥
हिंदी अनुवाद:
इस पृथ्वी पर तीन रत्न हैं — जल, अन्न और सुंदर वचन (सुभाषित)। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों में ही रत्न समझते हैं।
5.
संस्कृत:
स्वभावाद् बलमाश्रित्य, यो हि जीवति मानवः ।
स लोके लभते कीर्तिं, परत्र च शुभां गतिम् ॥ ५ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो मानव अपने स्वभाव के बल पर जीवित रहता है, वह इस लोक में कीर्ति (यश) प्राप्त करता है और परलोक में भी शुभ गति प्राप्त करता है।
6.
संस्कृत:
मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पण्डितः ॥ ६ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो परायी स्त्रियों को माँ के समान, पराये धन को मिट्टी के ढेले के समान और समस्त प्राणियों को अपने समान देखता है, वही पंडित (सच्चा विद्वान) है।

Wednesday, 22 July 2026

Class 7 Sanskrit ch 4

दक्षिण दिशा में महिला रोप्य नाम का एक नगर था। उस नगर में एक विशाल बरगद का पेड़ (वटवृक्ष) था। वृक्ष के ऊपर बहुत से पक्षी घोंसलों में रहते थे।
​एक बार एक शिकारी उस नगर में आया। उसने बरगद के पेड़ के नीचे जाल फैलाकर उसके ऊपर चावल के दाने बिखेर दिए, और स्वयं पास में ही छिपकर बैठ गया।
​इसके बाद चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा आकाश में उड़ रहा था। उसके साथ बहुत से कबूतर भी थे। जब उन्होंने धरती पर चावल के दाने देखे, तब वे उन्हें खाने के लिए नीचे आए। इस प्रकार वे सभी लालच के कारण जाल में फँस गए।
​चित्रग्रीव बहुत बुद्धिमान था। उसने शिकारी को देखकर कबूतरों से कहा—
​"तुम सब चिंताकुल (व्याकुल) मत हो, बल्कि इस जाल को लेकर साथ ही शीघ्रता से उड़ जाओ।"
​चित्रग्रीव के कहने के अनुसार सभी कबूतर जाल के साथ ही उड़ गए।
​चित्रग्रीव कबूतरों को वन के उस भाग में ले गया, जहाँ हिरण्यक नाम का चूहा रहता था। हिरण्यक उसका मित्र था। चित्रग्रीव के आदेश से सभी कबूतर वहाँ उतरे।
​चित्रग्रीव ने हिरण्यक को सारा वृत्तान्त (हाल) बताया और प्रार्थना की— "हे मित्र! इस जाल को काटकर मेरे परिवारजनों (साथियों) को बंधन से मुक्त करो।"
​चित्रग्रीव के आग्रह पर हिरण्यक ने शीघ्र ही उनका जाल काट दिया। इस प्रकार वे कबूतर जाल से स्वतंत्र हो गए और उन्होंने पुनः (नया) जीवन प्राप्त किया।
​सच ही कहा गया है—
​संघे शक्तिः, भेदे नाशः।
(संगठन/एकता में शक्ति होती है और फूट में नाश होता है।)

Monday, 20 July 2026

sanskrit Class 6 path 9 ahm vriksha asmi

मैं वृक्ष हूँ। पादप, तरु, वितप — ये सभी मेरे ही नाम हैं। मैं स्वयं धूप में खड़ा रहता हूँ और दूसरों को छाया प्रदान करता हूँ। मेरी शाखाओं में पक्षी घोंसले बनाते हैं। मेरे फल पशुओं के लिए आहार बनते हैं। मेरे फल, फूल, पत्ते, लकड़ी, जड़ें और छोटी-छोटी टहनियाँ — मेरा हर अंग दूसरों के हित के लिए होता है।
मैं वातावरण को शुद्ध करता हूँ। वर्षा के मौसम में भी मैं सहायक हूँ। मैं ही जल-प्रलय से धरती की रक्षा करता हूँ। मेरे बिना घरों, जंगलों और बगीचों की शोभा नहीं है। मूर्ख लोग छोटे-छोटे लाभ के लिए मुझे काटते हैं। इससे मुझे बहुत कष्ट होता है।
वृक्षों के जीवन से ही संसार का जीवन है। इसलिए हमारी रक्षा करना मानव का कर्तव्य है। हम तो दूसरों के कल्याण के लिए ही जीते हैं। कवि सत्य कहते हैं —
जो अपना सर्वस्व अर्पित करते हैं,
पराये हित के लिए ही,
वे वृक्ष सदैव जीवित रहें,
पृथ्वी पर सज्जनों की तरह॥

Class 8, पाठ 2 समयस्य सदुपयोग :

इस संसार में मानव जीवन दुर्लभ है। वहाँ (संसार में) मनुष्य जन्म लेकर भी मनुष्य समय का महत्त्व नहीं जानता। मानव जीवन में समय का बहुत महत्त्व है।

​संसार में अन्य नष्ट हुई वस्तुएँ पुनः प्राप्त की जा सकती हैं, परंतु बीता हुआ समय किसी भी उपाय से पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति की आयु का जो हिस्सा व्यर्थ चला गया, वह चला ही गया। अतः ऐसा प्रयत्न करना चाहिए जिससे एक क्षण का भी दुरुपयोग न हो, क्योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

​संसार में बहुत से लोग व्यर्थ में ही इधर-उधर घूमकर समय बिताते हैं। कुछ लोग तो आलस के कारण निरंतर बैठे ही रहते हैं। आलस के कारण वे अपने दैनिक कार्य भी नियम से नहीं करते। इसलिए वे रोगी हो जाते हैं। कुछ आलसी लोग तो खेलने में या सोने में ही अपना सारा समय बिता देते हैं और अपने जीवन के बहुमूल्य हिस्से को व्यर्थ गँवा देते हैं।
​समय का सदुपयोग जीवन की सफलता की पहली सीढ़ी, उन्नति का मूल मंत्र और आत्म-निर्माण का उत्तम साधन है। प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है कि किसी को भी समय का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। जो लोग कभी भी समय का दुरुपयोग नहीं करते और सदैव काम में लगे रहते हैं, वे सुख से रहते हैं। ऐसे कर्मवीर ही सब जगह श्रेष्ठ पद प्राप्त करते हैं।
​छात्रों के लिए तो समय का सदुपयोग ही उन्नति का साधन है। जो छात्र समय का सदुपयोग करके पढ़ाई करते हैं, वे अपने जीवन में सफल होते हैं। इस प्रकार समय का सदुपयोग मनुष्यों के कल्याण के लिए होता है।

Sunday, 12 July 2026

Bhikshuk


भिक्षुक
कवि - सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

 निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1. वह आता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर है एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को - भूख मिटाने को
मुँह फटी-पुरानी झोली को फैलता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता

प्रश्न – 1 ‘दो टूक कलेजे के करता’ - से कवि का क्या आशय है ?

उत्तर – हिंदी के निराले कवि ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ जी द्वारा रचित उपर्युक्त पंक्ति का आशय यह है कि एक भिक्षुक हृदय से दुखी होता हुआ पश्चताप करता हुआ सड़क पर आ रहा है, वह लोगों से कुछ खाने के लिए माँगता है परंतु उसे बदले में केवल अपमान और फटकार ही मिलती है। इसलिए उसका हृदय टूट जाता है।

प्रश्न – 2 ‘पेट-पीठ दोनों मिलकर है एक’ - पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए ?

उत्तर – ‘पेट-पीठ दोनों मिलकर है एक’ - पंक्ति का आशय यह है कि एक दुखी भिक्षुक काफी दिनों से भूखा है। उसे कुछ भी खाने के लिए प्राप्त नहीं हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उसका पेट और पीठ मिलकर एक हो गए है। लोगों से भीख माँगने पर भी उसे केवल अपमान और दुख ही प्राप्त होता है।

प्रश्न - 3 उपर्युक्त पंक्तियों के आधार पर भिक्षुक की दयनीय दशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर – उपरोक्त पंक्तियों में महाकवि ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ जी ने एक असहाय भिक्षुक की दयनीय दशा का चित्रण करते हुए कहा है कि वह हृदय से दुखी होता हुआ और अपने भाग्य पर पछताता हुआ लाठी के सहारे सड़क पर आ रहा है। वह कई दिनों से भूखा है जिस कारण उसका पेट और पीठ मिल गए हैं,परंतु उसकी दयनीय दशा का निवारण करने वाला कोई नहीं। वह मुट्ठी भर दाने पाने के लिए बड़ी उम्मीद से अपनी झोली फैला रहा है।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने लोगों की दयाहीनता की भावना को प्रदर्शित किया है। एक भिक्षुक जो कई दिनों से भूखा प्रतीत होता हैं और जिस कारण उसका पेट और पीठ एक हो गए हैं, लाठी के सहारे सड़क पर आ रहा है और झोली फैलाकर लोगों से मुट्ठी भर दाने की गुहार लगा रहा है लेकिन लोगों में दयाहीनता होने के कारण उसे भूखा रहना पड़ता है।


2. साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
 बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,
 और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाएं।
 भूख से सुख ओंठ जब जाते,
 दाता-भाग्य, विधाता से क्या पाते?
 घूँट आँसुओं का पीकर रह जाते।

प्रश्न – 1 भिक्षुक के साथ कौन है? वे क्या कर रहे हैं तथा क्यों? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – भिक्षुक के साथ दो बच्चे भी हैं। अपनी भूख प्रदर्शित करने के लिए और लोगों का ध्यान केंद्रित करने के लिए वे अपने बाएँ हाथ से अपना पेट मिल रहे हैं और दाहिने हाथ से लोगों से कुछ सहायता करने की प्रार्थना कर रहे हैं।

प्रश्न – 2 ‘दाता-भाग्य-विधाता’ ने कवि का संकेत किन की ओर है? कौन किन से क्या प्राप्त नहीं कर पाते ?

उत्तर – दाता-भाग्य विधाता से कवि का संकेत उन लोगों की ओर है जो उनको भोजन देने के लिए समर्थ हैं, परंतु दयाहीनता के अभाव में वे उन्हें असहाय छोड़ देते हैं। भिक्षुक के दोनों बच्चे आने वाले लोगों से कुछ भी खाने के लिए प्राप्त नहीं कर पाते।

प्रश्न – 3 ‘घूँट आँसुओं का पीकर रह जाते’ - मुहावरे का प्रयोग कवि ने किस संदर्भ में किया है? 

उत्तर – जब बच्चे और भिक्षुक लोगों के सामने हाथ फैलाते हैं, तब लोगों द्वारा कुछ न प्राप्त करने के कारण एवं भूखे रहने के कारण उनके होंठ सूख जाते हैं। वही अपमान और दुख के कारण वे आँसुओ का घूँट पीकर रह जाते हैं अर्थात अपना मन मसोसकर रह जाते हैं।

 प्रश्न – 4 भिक्षुक के बच्चों की दयनीय दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर – भिक्षुक के बच्चे अपने हाथ फैलाकर लोगों से भिक्षा माँग रहे हैं। बच्चे अपने बाएँ हाथ से अपना पेट मल रहे हैं और दाहिने हाथ से लोगों से कुछ दया, सहायता करने की प्रार्थना कर रहे हैं। वे इतने भूखे हैं कि उनके होंठ सूख चुके हैं। लोगों से अपमान और दुख के अतिरिक्त उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

3. चाट रहे जूठी पत्तल वे, कभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
 ठहरो, अहो। मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा।
 अभिमन्यु-जैसे हो सकोगे तुम,
 तुम्हारे दुख में मैं अपने हृदय को खींच लूँगा।

प्रश्न – 1 भिक्षुक तथा उसके बच्चे क्या करने के लिए विवश है और क्यों?

उत्तर – कई दिनों से भूखे रहने के कारण भिक्षुक तथा उसके बच्चे जूठी पत्तल चाटने को विवश हैं। अनेक प्रयासों व प्रार्थनाओं के बाद भी भिक्षुक व बच्चों को आसपास के लोगों से कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाता, इसलिए वे सड़क पर जूठी पत्तलों का बचा हुआ थोड़ा-सा भोजन चाट-चाटकर वे अपनी भूख मिटाने का प्रयत्न कर रहे हैं।

प्रश्न – 2 ‘और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए’ - पंक्ति द्वारा कवि क्या स्पष्ट करना चाहता है?

उत्तर – भिक्षुक व उसके बच्चे कई दिनों से भूखे हैं और किसी से भी कोई सहायता नहीं मिलने के कारण वे सड़क पर झूठी पत्तलों पर बचा-खुचा थोड़ा-सा भोजन चाट-चाट कर अपनी भूख मिटाने का प्रयत्न कर रहे हैं लेकिन उसके लिए भी उन्हें कुत्तों से संघर्ष करना पड़ रहा है। अतः निराला जी यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि भिक्षुक व उसके बच्चों की दशा पशुओं से भी हीन है।

प्रश्न – 3 भिक्षुक कविता में कवि ने समाज को किस बात के लिए फटकारा है?

उत्तर – भिक्षुक कविता में कवि ने समाज के समर्थ वर्ग के लोगों को फटकारा है जो समर्थ होते हुए भी भीख नहीं देते हैं और उन्हें अपमान करके भगा देते हैं। इसी दयाहीनता के कारण वह व्यक्ति भूखा मर जाता है। इसी बात के लिए निराला जी ने ऐसे दयाहीन समाज को फटकारा है।

प्रश्न – 4 उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने ‘अभिमन्यु’ शब्द का प्रयोग किस लिए किया है?

उत्तर – कवि ने ‘अभिमन्यु’ शब्द का प्रयोग भिक्षुक को प्रेरित करने के लिए किया है ताकि वे अभिमन्यु के समान संघर्ष कर सके। जिस प्रकार अभिमन्यु अकेले ही युद्ध में चक्रव्यूह भेदने के लिए गया था पर अंत में वह लौटते समय सात महारथियों के एक साथ प्रहार से मर गया था और मरने के बाद भी अपनी वीरता के कारण हमेशा के लिए अमर हो गया। इसी तरह की कल्पना कवि भिक्षुक के लिए भी करते हैं।

Wednesday, 8 July 2026

Hindi Ch 6 सम्मान

 प्रस्तुत पंक्तियों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखकर लिखिए - 

1. “क्या मैं अछूत हूँ जो आप मेरे साथ खाना नहीं खाती?”
प्र०-1 प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता व श्रोता कौन हैं?
उत्तर : प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता निभा व 
श्रोता उसकी साथ की लड़कियाँ हैं।
प्र०-२ लड़कियों ने निभा की बात का क्या जवाब दिया?
उत्तर :  लड़कियों ने निभा को जवाब देते हुए कहा कि हमें गँवारों के साथ खाना अच्छा नहीं लगता।
प्र०- 3 निभा कैसी लड़की थी?
उत्तर : निभा एक सकारात्मक विचारों वाली प्रतिभाशाली व बुद्धिमान लड़की थी।


2. “तुमने अपने परिवार _ _ _ _ _ _ _प्रदेश का गौरव बढ़ाया है।”

प्र०-1 प्रस्तुत पंक्तियां किसने, किससे कही है?
उत्तर प्रस्तुत पंक्तियाँ जिलाधिकारी साहब ने निभा से कही है।

प्र०-२ जिलाधिकारी साहब ने ऐसा क्यों कहा?
उत्तर : निभा ने कला संगीत व पढ़ाई में पूरे प्रदेश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। इसी कारण जिलाधिकारी साहब ने निभा को बधाई देते हुए ऐसा कहा।

प्र०-३ जिलाधिकारी साहब निभा के घर क्यों गए थे?
उत्तर : जिलाधिकारी साहब निभा के घर उसे बधाई देने तथा राज्यपाल के द्वारा दिए जाने वाला सम्मान का आमंत्रण पत्र देने गए थे।

कक्षा 7 : संस्कृत : पाठ 2 : नीतिश्लोक

कक्षा 7
पाठ 3 नीति- श्लोक 

​1. पहला श्लोक
​श्लोक: विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मः ततः सुखम्।।
​सरल अनुवाद: विद्या (ज्ञान) हमें विनम्रता देती है। विनम्रता से इंसान में योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता होने से धन की प्राप्ति होती है, धन से इंसान धर्म के कार्य (अच्छे काम) करता है और अंत में उसे सुख मिलता है।
​सीख: अगर हम अच्छे से पढ़ाई करेंगे, तो हमारे जीवन में सुख-शांति अपने आप आ जाएगी।

​2. दूसरा श्लोक
​श्लोक: आचारः प्रथमो धर्मः, आचारः परमं तपः।
आचारः परमं ज्ञानम्, आचारात् किं न सिध्यति।।
​सरल अनुवाद: अच्छा आचरण (अच्छा व्यवहार या संस्कार) ही सबसे पहला धर्म है। अच्छा आचरण ही सबसे बड़ी तपस्या है और अच्छा आचरण ही सबसे बड़ा ज्ञान है। अच्छे आचरण से दुनिया में ऐसा क्या है जो हासिल नहीं किया जा सकता? (अर्थात, अच्छे व्यवहार से सब कुछ मिल सकता है)।
​सीख: हमें हमेशा सबके साथ तमीज और अच्छे संस्कार से पेश आना चाहिए।

​3. तीसरा श्लोक
​श्लोक: प्रिय-वाक्य-प्रदानेन, सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं, वचने का दरिद्रता।।
​सरल अनुवाद: मीठे और प्यारे वचन (बोल) बोलने से सभी जीव-जंतु और इंसान खुश हो जाते हैं। इसलिए हमें हमेशा मीठी वाणी ही बोलनी चाहिए। भला अच्छे और मीठे बोल बोलने में कैसी कंजूसी (दरिद्रता)?
​सीख: हमेशा सबसे प्यार से बात करनी चाहिए, क्योंकि मीठा बोलने में कोई पैसे नहीं लगते!

​4. चौथा श्लोक
​श्लोक: छायामन्यस्य कुर्वन्ति, स्वयं तिष्ठन्ति आतपे।
फलान्यपि परार्थाय, वृक्षाः सत्पुरुषाः इव।।
​सरल अनुवाद: पेड़ खुद तो कड़ी धूप में खड़े रहते हैं, लेकिन दूसरों को ठंडी छाया देते हैं। उनके फल भी दूसरों के भले के लिए (खाने के लिए) ही होते हैं। सचमुच, पेड़ सज्जन (अच्छे) लोगों की तरह होते हैं, जो हमेशा दूसरों की मदद करते हैं।
​सीख: हमें भी पेड़ों की तरह परोपकारी बनना चाहिए और दूसरों की मदद करनी चाहिए।

​5. पांचवां श्लोक
​श्लोक: प्राणान् त्यजति देशाय, पीडितानां सहायकः।
यः आचरति कल्याणं, लोके मानं सः विन्दति।।
​सरल अनुवाद: जो इंसान अपने देश के लिए अपने प्राण तक दे देता है, जो दुखियों और पीड़ितों की मदद करता है और जो हमेशा सबका भला (कल्याण) करता है—वही इंसान इस संसार में सच्चा सम्मान और आदर पाता है।
​सीख: देशप्रेम और दूसरों की सेवा करने वाले इंसान को दुनिया हमेशा याद रखती है।

​6. छठा श्लोक
​श्लोक: जाड्यं धियो हरति, सिञ्चति वाचि सत्यम्,
मानोन्नतिं दिशति, पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति, दिक्षु तनोति कीर्तिम्,
सत्सङ्गतिः कथय, किं न करोति पुंसाम्।।

​सरल अनुवाद: अच्छी संगति (सत्सङ्गति) इंसान के लिए क्या-क्या नहीं करती?
​यह बुद्धि की मूर्खता को दूर करती है।
​हमारी वाणी (बोली) में सच्चाई भरती है।
​समाज में मान-सम्मान बढ़ाती है।
​हमें पाप और गलत कामों से बचाती है।
​हमारे मन को खुश रखती है।
​चारों दिशाओं में हमारा यश (नाम) फैलाती है।
सच कहो, अच्छे दोस्तों की संगति इंसान का हर तरह से भला करती है!
​सीख: हमें हमेशा अच्छे और संस्कारी बच्चों को ही अपना दोस्त बनाना चाहिए।

Class 7 : संस्कृत : पाठ 6 : ऋषिकेश

कक्षा 7 - पाठ 6
ऋषिकेश 

हमारे देश का नाम भारतवर्ष है, जो बहुत ही सुंदर और विशाल (भव्य) है। इस देश में सब जगह प्राकृतिक सुंदरता दिखाई देती है। भारत के विशाल और सुंदर स्थानों में 'ऋषिकेश' भी एक देखने योग्य (दर्शनीय) स्थान है।
ऋषिकेश, गंगा के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल 'हरिद्वार' से 19 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ों से घिरा हुआ है। यहाँ गंगा अपनी प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है। गंगा और पहाड़ों की हरियाली से घिरा हुआ ऋषिकेश एक बहुत ही सुंदर और पवित्र तीर्थ स्थल है।
साधु और महात्मा लोग इस स्थान पर अपनी आत्मा और परमात्मा का ध्यान करते हैं। इसके अलावा, कवि और लेखक भी यहाँ की कोमल कल्पनाओं में डूबकर अपनी कलम से सुंदर काव्यों की रचना करते हैं।
वैज्ञानिक रूप से भी ऋषिकेश का बहुत महत्व है। यहाँ स्थित पर्वत श्रृंखलाओं (पहाड़ों) में कई प्रकार की औषधियाँ (जड़ी-बूटियाँ) भी पैदा होती हैं। आयुर्वेद के आचार्य (डॉक्टर) उनका उपयोग भयानक बीमारियों को ठीक करने के लिए करते हैं।
ऋषिकेश के देखने योग्य स्थानों में 'लक्ष्मण झूला' सबसे पहला (प्रमुख) है। यह एक ऐसा पुल है जिसका निर्माण गंगा नदी को पार करने के लिए किया गया था। जब इस पुल पर लोग चलते हैं, तब यह हिलता (कंपित होता) है। यहाँ 'गरुड़ चट्टी' भी एक दर्शनीय स्थल है।
इस स्थान से थोड़ी ही दूरी पर 'गीता भवन' नाम का प्रसिद्ध आश्रम है। महर्षि कण्व का आश्रम भी इसी स्थान पर था। राजा भरत की माता शकुंतला का पालन-पोषण भी इसी आश्रम में हुआ था। नगरों के शोर-शराबे (कोलाहल) से दूर यह स्थान वास्तव में आत्म-उन्नति (आध्यात्मिक विकास) का स्थान है।

Monday, 6 July 2026

ch 8 Sanskrit class 6


लंबे समय की गुलामी (परतंत्रता) के कष्ट को सहकर हमारा देश भारत वर्ष 1947 में अगस्त महीने की पंद्रह तारीख को अंग्रेजों के शासन से स्वतंत्र हुआ। तब भारत का नवीन संविधान वर्ष 1950 में जनवरी महीने की छब्बीस तारीख से लागू (प्रचलित) हुआ। इसलिए, गणतंत्र शासन की शुरुआत होने के कारण इस दिन को **'गणतंत्र दिवस'** कहा जाता है। अतः हम हर वर्ष इस दिन महान उत्सव (महोत्सव) मनाते हैं।
इस दिन सब जगह अवकाश (छुट्टी) होती है। भारत के सभी शहरों और गाँवों में गणतंत्र दिवस का भव्य (महान) समारोह होता है। सभी लोग अपने-अपने शहरों और गाँवों में बड़े उत्साह और उल्लास के साथ गणतंत्र दिवस का आयोजन करते हैं। परंतु देश की राजधानी दिल्ली तो इस अवसर पर विशेष रूप से सजी होती है।
भारत की राजधानी दिल्ली नगरी में सभी प्रदेशों (राज्यों) से लोग समारोह देखने आते हैं। सुबह से ही लाखों लोग 'भारत द्वार' (**इंडिया गेट**) पर एकत्रित होते हैं। तब राष्ट्रपति अपने विशेष वाहन से अंगरक्षकों के साथ विजय चौक (विजय-चतुष्पथ) पर आते हैं। तोपों की गर्जना (सलामी) से राष्ट्रपति का अभिनंदन किया जाता है। इसके बाद जल सेना, थल सेना और वायु सेना के सैनिक राष्ट्रपति का अभिवादन करते हैं। इसके बाद हवाई जहाज (वायुयान) आकाश से फूलों की वर्षा करते हैं।
लाखों लोग यह सब देखकर तालियाँ बजाते हैं और राष्ट्र की सेवा के लिए प्रतिज्ञा करते हैं। वास्तव में, गणतंत्र दिवस भारत के लिए महान गौरव प्रदान करने वाला है।

Class 6 - नर हो न निराश करो मन को


​निम्नलिखित प्रश्नों को पढ़कर उत्तर लिखो :—

​1. "संभलो की सुयोग न जाए चला — — — को।
​प्र० 1 मनुष्य जीवन की सार्थकता किसमे है?
​उ० - मनुष्य जीवन की सार्थकता निरंतर ऐसे कर्म करते हुए जीवन व्यतीत करने में है जिससे जीवन सार्थक हो सकें, और दूसरों का हित हो सकें।

​प्र० 2 मनुष्य को सदैव किस बात का ज्ञान रखना चाहिए?
​उ० - मनुष्य को सदैव अपने गौरव व आत्मसम्मान का ज्ञान रहना चाहिए।

​प्र० 3 मनुष्य को अपने गौरव का किस प्रकार ध्यान रखना चाहिए?
​उ० - मनुष्य को अपने गौरव का ध्यान इस प्रकार के कर्म करके रखना चाहिए, जिससे किसी भी मूल्य पर उसके मान-सम्मान को ठेस न लगने पाये।

​प्र० 4 मानव जीवन की सार्थकता क्या होती है?
​उ० - मनुष्य जीवन की सार्थकता बिना निराश हुए कर्म करते रहने में होती है।


​2. "प्रभु — — — मन को।"
​प्र० 1 प्रस्तुत पंक्तियों को माध्यम से कवि हमे क्या समझाना चाहते हैं?
​उ० - कवि समझाना चाहते हैं कि मनुष्य को कभी कर्त्तव्य पथ से विमुख नही होना चाहिए। सह सदैव प्रसन्नता के साथ कर्म करते रहना चाहिए। फल की आशा नही करनी चाहिए।

​प्र० 2 मनुष्य — — — प्रभु ने क्या दान में दिया?
​उ० - मनुष्य को भगवान ने हाथ दान मे दिए है जिनसे वह अवांछित वस्तु को भी प्राप्त कर सकते हैं।

​प्र० 3 मनुष्य संसार मे यश का भागी कैसे बनेगा?
​उ० - मनुष्य को नित्य अपने गौरव का ध्यान रहना चाहिए तभी वह अच्छे कार्य कर संसार में यश प्राप्त करेगा।

​प्र० 4 मनुष्य किसका अंश है?
​उ० - मनुष्य जगदीश्वर अर्थात् ईश्वर का अंश है।
​प्र० 5 वांछित व अलभ्य शब्दों का अर्थ लिखो।
​उ० - वांछित व अलभ्य का अर्थ - इच्छित और अलभ्य का अर्थ – अप्राप्य है।

​प्र० 6 प्रस्तुत कविता से हमे क्या सीख मिलती है?
​उ० - "मन को हारे हार है मन के जीते जीत" मनुष्य को अपने मन को कभी उदास व निराश नही होने देना चाहिए।

Sunday, 5 July 2026

Monday, 18 May 2026

Class 8 : भिखारिन

पाठ 8
भिखारिन 

प्रस्तुत पंक्तियों को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
क. “सुबह से शाम तक वह इसी प्रकार हाथ फैलाए खड़ी रहती।”

प्र.1. बुढ़िया की जीविका का साधन क्या था?
उत्तर: बुढ़िया भीख माँगकर अपनी जीविका चलाती थी।
प्र.2. भिखारिन की झोपड़ी कहाँ थी?
उत्तर: भिखारिन की झोपड़ी मंदिर के पास थी।
प्र.3. झोपड़ी के पास पहुँचते ही उसके पास कौन आता था?
उत्तर: झोपड़ी के पास पहुँचते ही उसके पास दस वर्ष का एक लड़का उछलता -कूदना आता और उससे चिपट जाना।
प्र.4. लड़के का क्या नाम था?
उत्तर: लड़के का नाम मोहन था।
प्र.5. बुढ़िया मंदिर के दरवाजे पर क्यों खड़ी रहती थी?
उत्तर- अंधी बुढ़िया प्रतिदिन मंदिर के आगे भिक्षा मांगने के लिए खड़ी होती थी। 
प्र.6. बुढ़िया ने अपनी हाँडी किसके पास रखी?
उत्तर- बुढ़िया को डर था कि उसके इकट्ठा किए हुए पैसे कहीं चोरी न हो जाएं, इसलिए उसने अपनी हाँडी सेठ बनारसी दास के पास रखवा दी।

ख. "सेठ जी ने हाँड़ी की ओर देखकर कहा, "इसमें क्या है?"
​प्र०1- काशी में सेठ बनारसी दास का व्यक्तित्व कैसा था?
उत्तर- काशी में सेठ बनारसी दास बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति थे। बच्चा-बच्चा उनकी कोठी से परिचित था। बनारसी दास बड़े देवभक्त और धर्मात्मा थे।

​प्र०2- अंधी ने हाँड़ी सेठ जी के आगे सरकाते हुए क्या कहा?
उत्तर- अंधी ने हाँड़ी सेठ जी के आगे सरका दी और उसने डरते-डरते कहा "सेठ जी! इसे अपने पास जमा कर लीजिए। मैं अंधी अपाहिज कहाँ रखती फिरूँगी?"

​प्र०3- मोहन को सेठ जी ने कैसे पहचाना?
उत्तर-   बच्चे को देखकर सेठ को ऐसा लगा कि उस बच्चे की सूरत उसके बेटे मोहन से मिलती है, जो सात वर्ष पूर्व खो गया था। जब उसकी जाँघ पर एक लाल रंग का चिह्न था। इस विचार के आते ही उन्हें विश्वास हो गया कि बच्चा उन्हीं का है।

​प्र०4- मोहन ने आँख खोलते ही किसे पुकारा?
उत्तर- मोहन ने आँख खोलने पर अपनी बुढ़िया माँ को पुकारा।

​प्र०5- सेठ जी के अनुचित व्यवहार पर बुढ़िया क्या सोच रही थी?
उत्तर- सेठ जी के अनुचित व्यवहार पर उसे रह-रहकर क्रोध आता था। वह सोचती इतना धनी व्यक्ति है, दो-चार रूपये दे देता तो क्या चला जाता? और फिर मैं उससे कुछ दान तो नहीं माँग रही थी, अपने ही रूपये माँग रही थी।
​प्र०6- पाठ के लेखक का नाम बताओ-
उत्तर- पाठ के लेखक का नाम रवीन्द्रनाथ टैगोर है।

​प्र०7- पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है।
उत्तर- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि स्वार्थ सिद्धि के लिए मानवता को कभी नहीं भूलना चाहिए। मानवीय मूल्य ही आपको महान बनाते हैं। संसार में कर्म प्रधान है धन नहीं।

Friday, 15 May 2026

Vihan class 7

पाठ - 6
विहान 

प्रस्तुत पंक्तियों को पढ़कर इन प्रश्नों का उत्तर दीजिए :-
(1) “नव - जीवन _ _ _ _ _ _ समान।”

प्र. 1) कवि किसका प्रेमी बनाना चाहता है?
उत्तर 1) कवि चिर महान की भक्ति कर उस अनंत शक्ति का प्रेमी बनने की कामना कर रहे हैं जो मानवता का कल्याण कर सके ।

प्र. 2) कवि विश्व में क्या लाने की इच्छा रखते हैं?
उत्तर 2) कवि विश्व में नव विहान लाने की इच्छा रखते हैं।

प्र. 3) इस प्रकार के कर्म करके कवि क्या करना चाहता है?
उत्तर 3) इस प्रकार के कर्म करके कवि मानव परित्राण करना चाहता है, जिससे जीवन में भय, संदेह और अंधविश्वास नष्ट हो व शांति का संदेश हो।

प्र. 4) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से ली गई हैं? कवि का क्या नाम है?
उत्तर 4) प्रस्तुत पंक्तियाँ “विहान'' नामक कविता से ली गई हैं। इसके कवि  सुमित्रानंदन पंत जी हैं।



(2) “पाकर _ _ _ _ _ _ _विहान।”

प्र.1. कवि कैसा प्रकाश बनना चाहता है?
उत्तर : कवि सभी को समान रूप में प्रकाशित करने वाला प्रकाश बनना चाहता है।
प्र.2. ‘नवजीवन’ का विहान’ पाने का आश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : इसका अर्थ संसार के संघर्षम्य वातावरण को परिवर्तित करके शांतिमय वातावरण का सृजन करना है।
प्र.3. ‘परित्राण’ व ‘अमरदान’ शब्दों के अर्थ लिखिए।
उत्तर : परित्राण शब्द का अर्थ ‘रक्षा करना’ है तथा अमरदान शब्द का अर्थ है — हमेशा के लिए किसी वस्तु का दान करना।
प्र.4. प्रस्तुत पंक्तियों में प्रयोग किए गए तुकांत शब्द लिखिए।
उत्तर-4. तुकांत शब्द — विहान व दान

प्र.5. कवि क्या कामना करना चाहता है?
उत्तर-5. कवि सभी को समान रूप में प्रकाशित करने वाला प्रकाश बनने की कामना करना चाहता है।

प्र.6. प्रस्तुत कविता से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: प्रस्तुत कविता में बताया गया है कि यदि प्रत्येक मनुष्य सत्य और प्रेम का आचरण करे तथा परस्पर  सहयोग और शांति से रहे तो विश्व में शीघ्र ही सुंदर व शांत नव विहान का आगमन होगा।

Wednesday, 13 May 2026

Namak Ka Daroga Class 7

पाठ - 7
नमक का दरोगा 

(1) सभी शब्दार्थ पुस्तक से लिखेंगे व याद करेंगे।

(2) निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए - 

1. " हम सरकारी हुक्म को _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ बाहर हो सकते है भला? ”

प्रश्न 1: प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता तथा श्रोता कौन हैं?
उत्तर : प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता पंडित अलोपीदीन तथा श्रोता मुंशी वंशीधर हैं।

प्रश्न 2  वक्ता ने ऐसा क्यों कहा?
उत्तर : मुंशी वंशीधर ने पंडित अलोपीदीन की गाड़ियों को पुल पार करते समय रोक लिया था और अलोपीदीन मुंशी वंशीधर को रिश्वत देकर अपनी गाड़ियों को छुड़वाना चाहता था, इसीलिए उसने ऐसा कहा।

प्रश्न 3 गाड़ियों में क्या लदा था? पंडित अलोपीदीन कौन थे?
उत्तर : गाड़ियों में नमक के ढेले थे,  जिसका चोरी-छिपे व्यापार किया जा रहा था। पंडित अलोपीदीन इलाके के सबसे प्रसिद्ध जमींदार थे।

प्रश्न 4 पंडित अलोपीदीन का किस पर अखंड विश्वास?
उत्तर : पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मी जी पर अखंड विश्वास था ।


2.  “पंडित जी ! मुझे ------ योग्य नहीं है।”

प्रश्न-1 पंडित जी ने वंशीधर को कौन-सा पद देने का निश्चय किया था ?
उत्तर : पंडित जी ने वंशीधर को अपनी सारी संपत्ति का स्थाई मैनेजर का पद देने का निश्चय  किया था। छह हजार वार्षिक वेतन के अतिरिक्त रोज़ाना खर्च अलग, रहने के लिए बंगला तथा अन्य सुविधाएँ भी दी थी।
प्रश्न-2 पंडित अलोपीदीन वंशीधर की किस बात से प्रभावित थे?
उत्तर : पंडित अलोपीदीन वंशीधर की ईमानदारी तथा उसकी कर्तव्यपरायणता से प्रभावित थे।

प्रश्न - 3 प्रस्तुत पंक्ति किसने किससे कही हैं?
उत्तर - प्रस्तुत पंक्ति मुंशी वंशीधर ने पंडित अलोपीदीन से कही है।

प्रश्न - 4 प्रस्तुत पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर - प्रस्तुत पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें किसी भी मूल्य पर अपने कर्त्तव्य, धर्म और सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए।

Tuesday, 31 March 2026

Class 8 मैं सुमन हूँ / बाँस

पाठ – 1 : मैं सुमन हूँ
1. प्रस्तुत कविता के शब्दार्थ पुस्तक से लिखें।
2. प्रस्तुत पंक्तियों को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए –
(क) व्योम के नीचे _ _ _ _ _ _ मैं सुमन हूँ।
प्रश्न 1 सुमन का आवास कहाँ होता है?
उत्तर : सुमन का आवास खुले आकाश के नीचे होता है।
प्रश्न 2 सुमन किसके साथ रहता है?
उत्तर : सुमन काँटों के साथ रहता है।
प्रश्न 3 काँटों के साथ रहने पर भी सुमन कैसा रहता है?
उत्तर : काँटों के साथ रहने पर भी सुमन प्रसन्नता के साथ रहता है।
प्रश्न 4 सुमन संबोधन किसके लिए किया गया है और क्यों?
उत्तर : सुमन संबोधन फूलों के लिए किया गया है। फूलों के माध्यम से कवि हम सभी मनुष्यों को भी संबोधित कर रहे हैं। कवि फूलों के माध्यम से मनुष्यों को प्रेरणा देना चाहते हैं कि जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना हमे सुमन के समान हमेशा प्रसन्नता के साथ करना चाहिए।
प्रश्न 5 कवि और कविता का नाम लिखिए –
उत्तर : कवि का नाम द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी और कविता का नाम “मैं सुमन हूँ” है।
(ख) रूप का श्रृंगार यदि मैंने किया है _ _ _ _ _ _“मैं सुमन हूँ।”
प्रश्न 1 प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने प्रकृति के किस रूप पर प्रकाश डाला है?
उत्तर : कवि ने पुष्प के माध्यम से प्रकृति की नि:स्वार्थता पर प्रकाश डाला है।
प्रश्न 2 श्रृंगार शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर : श्रृंगार शब्द का अर्थ ‘सजावट’ और ‘सौंदर्य’ है।
प्रश्न 3 सुमन के हृदय में क्या भरा है?
उत्तर : सुमन के हृदय में स्नेह व प्रेम भरा हुआ है जो मनुष्य को एक सूत्र भी बाँधकर प्रेम के साथ रहने की प्रेरणा दे रहे हैं।
प्रश्न 4 इस कविता का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर : इस कविता का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को
विपरीत परिस्थितियों में भी प्रसन्न रहना चाहिए। यदि जीवन दुख आए भी तो हमें घबराना नहीं चाहिए और साहस के साथ प्रसन्नता से आगे बढ़ना चाहिए।

पाठ 2 : बाँस

1 प्रस्तुत पाठ के शब्दार्थ पुस्तक से लिखें।

1- प्रस्तुत पंक्तियों को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:-
क : “इसी ने उसकी ------ ------ ------ नमन किया।”
प्रश्न 1 आदमी बार-बार बाँस को नमन क्यों कर रहा था?
उत्तर : आदमी को लगा की बाँस ने ही उसकी जान बचाई है इसलिए वह उसे भगवान के रूप में देखने लगा और उस भारी बाँस को पानी से बाहर खींचकर बार-बार नमन करने लगा।
प्रश्न 2 ‘कृतज्ञता’ शब्द का क्या अर्थ है? इसका विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर : कृतज्ञता शब्द का अर्थ है “आभार”। इसका विलोम शब्द ‘कृतघ्न’ होता है।
प्रश्न 3 आदमी बाँस लेकर कहाँ जा रहा था? उसने क्या निश्चय किया?
उत्तर : आदमी बाँस लेकर पत्तनग्राम जा रहा था। जो जंगल के दूसरे छोर पर था। आदमी ने निश्चय किया था कि वह बाँस को घर ले जाकर नित्य उसकी पूजा करेगा।

2  -  “आर्य, इसे जो ------ ------ भाव से देखा।“
प्रश्न 1 आर्य कहकर किसे संबोधित किया गया है?
उत्तर : आर्य कहकर बाँस लेने वाले आदमी को बुद्ध द्वारा
संबोधित किया गया है।
प्रश्न 2 प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता का परिचय दीजिए।
उत्तर : प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता बुद्ध जी हैं। इन्हें शास्ता और
तथागत भी कहा जाता है।
प्रश्न 3 आदमी बॉस को कृतज्ञ भाव से क्यों देख रहा था?
उत्तर : आदमी को यह ज्ञात था कि उन बाँस के कारण
ही उसकी जान बची है। इसलिए वह उस बाँस को कृतज्ञ
भाव से देख रहा था।
प्रश्न 4 तथागत ने आदमी को क्या परामर्श दिया था?
उत्तर : तथावत ने आदमी को विवेक से काम लेने की सलाह देते
हुए बाँस से के सिर से उतार फेंकने और आराम से
घर जाने का परामर्श दिया।
प्रश्न 5 प्रस्तुत पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर : प्रस्तुत पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि उपयोगिता
के आधार पर वस्तुओं का संग्रह करना ही बुद्धिमानीपूर्ण आचरण का परिचायक है।

Sunday, 29 March 2026

भेड़ें और भेड़िए

भेड़ें और भेड़िए


 निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर ki -

1. पशु समाज में इस क्रांतिकारी परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गई किs 🍋,🍋z, सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण युग अब आया और वह आया।

प्रश्न – 1 वन के पशुओं ने एकमत से क्या तय किया और क्यों ? ‘वe न में प्र🍋,जातंत्र की स्थापना’ का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर - एक बार.बन के 😂पशुओं को ऐसा लगा कि वह सभ्यता के उच्च स्तर पर पहुँच गए हैं, जहाँ एक अच्छी शासन व्यवस्था अपनानी चाहिए। एक मत से यह तय हुआ कि वन प्रदेश में प्रजातंत्र की स्थापना हो। वन में प्रजातं,त्र की स्थापना का आशय है कि ऐसी शासन प्रणाली जहाँ कोई किसी को न सताए और सभी सुख-समृzxद्धि एवं सुरक्षा का आनंद ले सकें। 

प्रश्न – 2 ‘क्रांतिकारी परिवर्तन’ का प्रयोग किस संदर्भ में किया गया है? स्प zzष्ट कीजिए।

उत्तर – वन में प्रजातंत्र शासन के संदर्भ में किया गया है। इन पंक्तियों के द्वारा लेखक स्पष्ट करना चाहते हैं कि प्रजातंत्र शासन जंगल में लागू होने पर सभी पशु अपने आप को सुरक्षित महसूस करेंगे। इससे जंगल में शांति आएगी।

प्रश्न - 3 जंगल⛱️c में हर्ष की लहर क्यों दौड़ गई? सुख समृद्धि और सुरक्षा के स्वर्ण युग का आशय स्पष्ट कीजिए। 🌗 

उत्तर – जंगल में हर्ष की ल हर इसलिए दौड़ गई क्योंकि जंगल में प्रजा,,तंत्र शासन लागू होने वाला था। सुख समृद्धि और सुरक्षा के स्वर्ण युग से लेखक का आशय है कि प्रजातंत्र शासन लागू होने से सभी जीव-जंतु सुख, समृद्धि और शांति का जीवन जी सकेंगे।

प्रश्न – 4 जंगल में किस प्रकार का प्रजातंत्र आया? उसका क्या परिणाम निकला? क्या सुख समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण युग आया?

उत्तर – भेड़िए के चमचे सियारों ने अपने जाल में फंसाकर भेड़ों के साथ बहुत बुरा किया जिससे जंगल में भेड़िए की तानाशाही हो गई। इसका यह परिणाम हुआ कि जं, zxगल की भेड़ें और भी असुरक्षित और भयभीत हो गईं और सुख-समृद्धि एवं सुरक्षा का स्वर्ण युग केवल एक सपना बनकर रह गया।

2. बूढ़े से आपने बड़ी गंभीरता से पूछा, “महाराज, आपके मुखचंद्र पर चिंता के में क्यों छाए हैं?”

प्रश्न – 1 ‘महाराज’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? उसकी चिंता का क्या कारण था और क्यों?😄

उत्तर – महाराज शब्द का प्रयोग भेड़िए के लिए किया गया है। उसकी चिंता का कारण प्रजातंत्र शासन था क्योंकि अब भेड़िए को यह आभास हो रहा था कि अब भेड़ों का शासन आ रहा है और अब उसे भूखा मरना पड़ेगा क्योंकि उसने भेड़ों के साथ बहुत बुरा किया था और उन्हें बहुत सताया था।

प्रश्न – 2 सियार ने उसकी बात सुनकर क्या उत्तर दिया? इस उत्तर से उसके चरित्र की किस विशेषता का पता चलता है?

उत्तर – सियार ने उसकी बात सुनकर कहा कि हम क्या जाने महाराज! हमारे तो आप ही ‘माई-बाप’ हैं। हम तो कोई और सरकार नहीं जानते। आप का दिया खाते हैं, आपके ही गीत गुनगुनाते हैं। लेखक ने सियार के माध्यम से उन लोगों पर व्यंग किया है जो नेताओं की चमचागिरी करते हैं और उनकी चापलूसी करते हुए आगे पीछे घूमते रहते हैं।

प्रश्न – 3 भेड़िए ने सियार को कौन-सी बात बताई और इस संदर्भ में अपनी किस घटनाएं का उल्लेख किया?

उत्तर – भेड़िए ने सियार को बताया कि अब वन प्रदेश में नई सरकार आने वाली है और अब हमारा राज चला जाएगा। अतः अब ऐसा समय आ रहा है कि हमें सुखी हड्डियां भी नसीब नहीं होंगी।
🌹❤️🌹
 प्रश्न – 4 बूढ़े सियार ने भेड़िए को उस कठिनाई से मुक्ति पाने के कौन से दो उपाय बताए? भेड़िए ने उसके उत्तर में क्या-क्या कहा?

उत्तर – बूढ़े सियार ने भेड़िए को उस कठिनाई से मुक्ति पाने के लिए पहला उपाय यह बताया कि वह सरकस में भर्ती हो जाए और दूसरा उपाय यह बताया कि वह अजायबघर में भर्ती हो जाए। भेड़िए ने उसके उत्तर में कहा कि सरकस में शेर और रीछ को ही लेते हैं और हम तो वैसे ही इतने बदनाम है कि कोई पूछता ही नहीं। दूसरे उपाय के उत्तर में भेड़िए ने कहा कि वह तो अब आदमी रखे जाने लगे हैं।

3. ‘मुसीबत में फँसे भेड़िए ने आखिर सियार को अपना गुरु माना और आज्ञापालन की शपथ ली।’

प्रश्न – 1 भेड़िया किस मुसीबत में फँस गया था? सियार ने उसे उसने मुसीबत से निकालने के लिए क्या आश्वासन दिया?

उत्तर – भेड़िया पंचायत के चुनाव की मुसीबत में फँस गया था। सियार ने उसे मुसीबत से निकालने के लिए यह आश्वासन दिया कि यदि चुनाव में भेड़िया जाति जीत जाए और आपकी सरकार बन जाए तो आप खुश हो जाएंगे।

प्रश्न – 2 बूढ़े सियार ने तीन सियारों को किस-किस रँग में रँगकर क्या-क्या रूप दिया और क्यों?

उत्तर – बूढ़े सियार ने तीनों सियारों को क्रमश: पीले, नीले और हरे रंग में रंग दिया था। पीला सियार बड़ा विद्वान, विचारक, कवि और लेखक है। नीला सियार नेता और पत्रकार है और हरा सियार धर्मगुरु है। बूढ़े सियार ने सियारों को इसलिए रंगा क्योंकि यह सियार ही भेड़िए का चुनाव प्रचार करेंगे और भेड़िया इन्हीं के दम पर चुनाव लड़ेगा।

प्रश्न – 3 बूढ़े सियार ने भेड़िए का रूप किस प्रकार बदला और क्यों?

उत्तर – बूढ़े सियार ने भेड़िए का रूप बदलने के लिए उसके मस्तक पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुख में घास के तिनके लगा दिए। सच्चाई यह थी कि बूढ़ा सियार भेड़िए को भेड़ों के मध्य एक संत और विश्वासपात्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहता था, जो भेड़ों के हितों की रक्षा करेगा।

प्रश्न – 4 सियार ने भेड़िए को किन किन बातों का ध्यान रखने को कहा?

उत्तर – सियार बोला “अब आप पूरे संत हो गए। अब भेड़ों की सभा में चलेंगे। मगर तीन बातों का ख्याल रखना अपनी आँखों को ऊपर मत उठाना, हमेशा जमीन की और देखना और कुछ मत बोलना नहीं तो सब पोल खुल जाएगी और वहाँ बहुत-सी भेड़े आएंगी,सुंदर-सुंद, मुलायम-मुलायम किसी को तोड़ मत खाना।”

4. ‘भाइयों और बहनों’ ! अब भय मत करो। भेड़िया राजा संत हो गए हैं। उन्होंने हिंसा बिलकुल छोड़ दी है। उनका हृदय परिवर्तन हो गया है।

प्रश्न – 1 ‘भाइयों और बहनों’ शब्द का प्रयोग किसने कब तथा किसके लिए किया है?

उत्तर – “भाइयों और बहनों” शब्द का प्रयोग बूढ़े सियार ने भेड़ियों और भेड़ों के लिए किया है। भेड़िए वन में दस प्रतिशत थे और भेड़ें नब्बे प्रतिशत थी। भेड़िए चालाक, हिंसक और भेड़ों के दुश्मन हैं। दूसरी ओर भेड़ें नेक, ईमानदार, कोम, विनयी, दयालु और निर्दोष पशु है।

प्रश्न – 2 बूढ़े सियार ने भेड़िए राजा के हृदय-परिवर्तन के संबंध में क्या-क्या कहा?

उत्तर – बूढ़े सियार ने भेड़िए राजा के हृदय परिवर्तन के संबंध में कहा कि भेड़िया राजा संत हो गए हैं, उन्होंने हिंसा बिलकुल छोड़ दी है। रात-दिन भगवान के भजन और परोपकार में लगे रहते हैं। उन्होंने अपना जीवन जीव-मात्र की सेवा में अर्पित कर दिया गया है। भेड़ों से उन्हें विशेष प्रेम है।

प्रश्न – 3 ‘भेड़ों से उन्हें विशेष प्रेम है’ - बूढ़े सियार ने इस संबंध में भेड़िए के बारे में क्या बताया?

उत्तर – बूढ़े सियार ने भेड़िए के विषय में बताते हुए कहा कि भेड़ों द्वारा सहे गए कष्टों को याद करके भेड़िए की आँखों में आँसू आ जाते हैं। भेड़ियों द्वारा भेड़ों पर किए गए अत्याचारों के कारण उनका सर लज्जा से झुका जाता है,इसलिए वे अपना शेष जीवन भेड़ों की सेवा में लगाकर तमाम पापों का प्रायश्चित करेंगे।

प्रश्न - 4 बूढ़े सियार ने एक मासूम भेड़ के बच्चे से संबंधित किस झूठी घटना कहानी सुनाई ।

उत्तर – बूढ़े सियार ने बताया कि आज सवेरे की ही बात है कि एक मासूम भेड़ के बच्चे के पाँव में काँटा लग गय, तो भेड़िया संत ने उसे दाँतो से निकाला, दाँतो से! पर अब वह बेचारा कष्ट से चल बसा, तो भेड़िए संत ने सम्मानपूर्वक उसकी अंत्येष्टि-क्रिया की। अब तो वे सर्वस्व त्याग चुके हैं। अब आप उनसे भय मत करें। उन्हें अपना भाई समझें। सब मिलकर बोलो संत भेड़िया की जय!

5. वे बोल नहीं सकते। अब आप इन तीनों रंगीन प्राणियों को देखिए। आप इन्हें न पहचान पाए होंगे। पहचानेंगे भी कैसे? ये इस लोक के जीव तो है नहीं ।।

प्रश्न – 1 वक्ता और श्रोता कौन है? ‘वे बोल नहीं सकते’- वाक्य का प्रयोग किसके लिए किया गया है? वक्ता ने उनके न बोल पाने का क्या कारण बताया है ?

उत्तर – वक्ता बूढ़ा सियार है और श्रोता भेड़े और वन्य जीव हैं। ‘वे बोल नहीं सकते’ वाक्य का प्रयोग संत भेड़िया राजा के लिए किया गया है। बूढ़ा सियार फिर बोला भाइयों और बहनों मैं भेड़िया संत से अपने मुखार-विंद से आपको प्रेम और दया का संदेश देने की प्रार्थना करता, पर प्रेमवश उनका हृदय भर आया है। वे गदगद हो गए हैं और भावातिरेक से उनका कंठ अवरुद्ध हो गया है इसलिए वह बोल नहीं सकते।

प्रश्न – 2 ‘इन्हें’ शब्द से किन की ओर संकेत किया गया है? उनका परिचय दीजिए।

उत्तर – ‘इन्हें’ शब्द से संत भेड़िया राजा की ओर संकेत किया गया है। वन प्रदेश में पंचायत का चुनाव होने वाला है दस प्रतिशत भेड़िए हैं और नब्बे प्रतिशत भेड़े निवास करती हैं। पहले वन में भेड़ियों का राज था जिससे उसने अपनी शक्ति के बल पर भेड़ों पर बहुत अत्याचार किए और हिंसा की अर्थात उसे अपनी शक्ति का बहुत घमंड है।

प्रश्न – 3 वक्ता ने ‘कवि’ बनाए गए सियार के संबंध में क्या बताया ?

उत्तर – वक्ता ने सियार के संबंध में बताया कि भाई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं। पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात है सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? कह रहे हैं कि जैसे स्वर्ग में परमात्मा वैसे ही पृथ्वी पर भेड़िया। हे भेड़िया जी, महान! आप सर्वत्र व्याप्त हैं, सर्वशक्तिमान हैं।

प्रश्न – 4 ‘भेड़े और भेड़िए’- शीर्षक कहानी में निहित व्यंग स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘भेड़ों और भेड़िए’ कहानी का उद्देश्य प्रजातंत्र में धोखेबाज झूठे, ढोंगी तथा चालाक राजनेताओं की पोल खोलना है। प्रस्तुत कहानी में भेड़े सीधे-साधे व्यक्तियों का प्रतीक है जो चालाक स्वार्थी और धन्यवाद राजनेताओं के बहकावे में आकर उनको चुनते हैं तथा चुने जाने के बाद भेड़िए रूपी यह राजनेता अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और भोली-भाली जनता का शोषण करते हैं। इस कहानी के माध्यम से ऐसे राजनेताओं की पोल खोली गई है।

Friday, 27 March 2026

Class 6 पाठ 1 व 2, खग उड़ते रहना जीवनभर व होमी जहाँगीर भाभा

शब्दार्थ पुस्तक से लिखें व याद करें।
निम्नलिखित पंक्ति को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए - 

पाठ - 1
खग उड़ते रहना जीवन भर

1. खग!................. जीवन भर!
प्र०1 अपना पथ कौन भूल गया है ?
उत्तर : कवि के अनुसार खग अपना पथ भूल गया है।
प्र० 2 कवि ने खग के माध्यम से क्या संदेश दिया है ?
उत्तर : कवि ने खग के माध्यम से मनुष्य को संदेश दिया है कि उसे जीवन पथ पर आने वाले संकटों से हताश होकर लक्ष्य मार्ग से पीछे नहीं हटना चाहिए।
प्र०3 कवि ने किस कार्य को मृत्यु से भी अधिक कष्टकारी कहा है ?
उत्तर : कवि ने अपने लक्ष्य से विमुख होकर पीछे हटने को मृत्यु से भी अधिक कष्टकारी कहा है।

2. यदि तू ———— जीवन भर !

प्रश्न 1 प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से ली गई हैं?
कवि का नाम बताइए।
उत्तर : प्रस्तुत पंक्तियाँ "खग उड़ते रहना जीवन भर" नामक कविता से ली गई हैं। इस कविता के कवि का नाम गोपालदास नीरज है।
प्रश्न 2 'बवंडर' शब्द का क्या अर्थ है? कवि ने खग के माध्यम से क्या प्रेरणा दी है?
उत्तर : ‘बवंडर’ शब्द का अर्थ उपद्रव है। कवि ने खग के माध्यम से मनुष्य को लक्ष्य प्राप्ति की ऊंचाइयों को छूने की प्रेरणा दी है।
प्रश्न 3 यदि खग लक्ष्य से विमुख होकर वापस लौट कर पड़ेगा तो क्या होगा?
उत्तर : यदि खग (मनुष्य) लक्ष्य से विमुख होकर वापस लौट पड़ेगा तो उसको प्रेम करने वाले लोग उससे उपहास का पात्र ही मानेंगे। अतः मनुष्य को सदैव अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए।

पाठ 2 : डॉ० होमी जहाँगीर भाभा 

प्रस्तुत पंक्तियों के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए –
1. “यह डॉ० भाभा के _ _ _ _ _ _ _ _ लोहा माना जाता है।”
प्रश्न 1 : डॉ० भाभा ने भारत के लिए क्या कल्पना की थी ?
उत्तर : डॉ० भाभा ने भारत के लिए परमाणु ऊर्जी कार्यक्रम की कल्पना की थी। इस कारण विश्वस्तर पर भी भारत के नाभिकीय कार्यक्रम का लोहा माना जाता है।
प्रश्न 2 डॉ० भाभा ने उच्च शिक्षा कहाँ से प्राप्त की ? उस संस्थान के विषय में बताइए।
उत्तर : डॉ० भाभा ने हाईस्कूल परीक्षा पास करने के बाद अपनी उच्च शिक्षा कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। उस समय कैंब्रिज विश्वविद्यालय भौतिक विज्ञान के अध्ययन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता था।
प्रश्न 3 : होमी जहाँगीर भाभा कौन थे ? उनका जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर : होमी जहाँगीर भाभा भारत के प्रमुख वैज्ञानिक थे। इनके जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई के एक पारसी परिवार में हुआ।

2 “किंतु डॉ० भाभा ने परमाणु _ _ _ _ _ _ उपयोगी सिद्ध होगी।
प्रश्न 1 : परमाणु ऊर्जा के विषय में डॉ० भाभा ने क्या विचार थे ?
उत्तर : डॉ० भाभा, परमाणु ऊर्जा के जनहित प्रयोग को समझते थे। वे जानते थे कि स्वतंत्र भारत को आगे बढ़ाने के लिए परमाणु ऊर्जा उपयोगी सिद्ध होगी।
प्रश्न 2 : भारत की आजादी से पूर्व डॉ० भाभा ने किसका ध्यान परमाणु ऊर्जा की ओर आकर्षित किया ?
उत्तर : भारत की आजादी से पूर्व डॉ० भाभा ने नेहरू जी का ध्यान परमाणु ऊर्जा की ओर आकर्षित किया।
प्रश्न 3 : TIFR का पूरा नाम क्या है? इसको किसने और कब प्रस्तावित किया? इसका उद्घाटन कब किया गया?
उत्तर : TIFR का पूरा नाम ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ है। इसको डॉ० भाभा ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1945 में प्रस्तावित किया। उसके बाद सन् 1962 में इसकी स्थायी इमारत का उद्घाटन किया गया।
प्रश्न 4 : डॉ० भाभा के सम्मान में श्रीमती इंदिरा गांधी ने क्या किया?
उत्तर : डॉ० भाभा के उत्कृष्ट कार्यों के सम्मान स्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी के परमाणु ऊर्जा संस्थान, ट्रॉम्बे (AEET) को डॉ० भाभा के नाम पर ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ (BARC) नाम दिया। यह अनुसंधान केंद्र भारत का गौरव है। आज भी विश्वस्तर पर परमाणु ऊर्जा के विकास में यह पथप्रदर्शक सिद्ध हो रहा है।


Revision work
प्रश्न 1 कवि खग के माध्यम से किसे प्रेरित कर रहे हैं?
उत्तर : कवि खग के माध्यम से मनुष्यों को प्रेरित कर रहे हैं।
प्रश्न 2 पंखो में गति न होने का क्या अर्थ है?
उत्तर : पंखों में गति न होने का अर्थ  थककर बैठ जाना है।
प्रश्न 3 : कवि ने प्रलय झकोरो किन्हे कहा है?
उत्तर : कवि ने प्रलय झकोरों जीवन पथ की कठिनाइयों को कहा है।
प्रश्न 4 : संसार किन लोगों के प्रति सम्मान प्रकट करता है?
उत्तर : संसार उन लोगों के प्रति सम्मान प्रकट करता है जो जीवन की कठिनाइयों से हार नहीं मानते और आवश्यकता पड़ने पर लक्ष्य प्राप्ति के लिए अपने जीवन का भी बलिदान कर देते हैं।
प्रश्न 5 : एटम बम कब, किसने और कहाँ गिराया?
उत्तर : द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका ने अगस्त 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर एटम बम गिराया।
प्रश्न 6 : TIFR की स्थाई इमारत का उद्घाटन किसके द्वारा किया गया?
उत्तर : सन 1962 में इस इमारत का उद्घाटन नेहरू जी के द्वारा हुआ।
प्रश्न 7 : डॉ भाभा के जीवन का महत्वपूर्ण परिवर्तन क्या था?
उत्तर : द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डॉ भाभा  इंग्लैंड नहीं जा पाए। डॉ भाभा ने बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में अध्यापन कार्य करने का निश्चय किया। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण परिवर्तन था।

Tuesday, 24 March 2026

Class 7 आत्मदीप व चमत्कार

कक्षा 7, पाठ – 1 (आत्मदीप)

शब्दार्थ किताब से लिखें

प्रस्तुत पंक्तियों के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1.  “मुझे न ------ देने को तैयार।”

प्रश्न-1) प्रस्तुत पंक्तियों में किसका मानवीकरण किया गया है?उत्तर-1 प्रस्तुत पंक्तियों में कवि द्वारा एक  लघु दीप का मानवीकरण किया गया है।

प्रश्न-2 मिट्टी का दीपक किसका प्रतीक है?उत्तर- मिट्टी का दीपक भूमि, जल, आकाश, वायु और अग्नि का प्रतीक है।

प्रश्न-3 ‘दीपक’ के माध्यम से कवि ने क्या संदेश दिया है?उत्तर- दीपक के माध्यम से कवि ने संदेश दिया है कि मनुष्य को भी स्वयं अपना दीपक बनकर सही मार्ग खोलना चाहिए तथा समाज को सही राह की ओर अग्रसर करना चाहिए।

2.  “पहले कर ------ दूसरी बार।”

प्रश्न- 1 प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से ली गई हैं? कवि का नाम बताइए।

उत्तर- प्रस्तुत पंक्तियाँ आत्मदीप नामक कविता से ली गई हैं। इसके रचयिता का नाम  ‘हरिवंश राय बच्चन’ हैं।

प्रश्न-2  ‘दीपक’ की तुलना किससे की गई है?

उत्तर-  ‘दीपक’ की तुलना मनुष्य से की गई है।

प्रश्न-3  प्रस्तुत पंक्तियों में प्रयोग किए गए तुकांत शब्दों को लिखिए।

उत्तर- बढ़ाए – पछताए

प्रश्न-4 दीपक और मनुष्यों में क्या समानता है?

उत्तर-  कवि ने मानव और दीप में समानता बताते हुए कहा है कि दीपक के सदृश ही समर्पित मानव भी संसार के कल्याण के लिए स्वयं बलिदान देने के लिए तत्पर रहता है।

कक्षा 7, पाठ – 4 (चमत्कार)

शब्दार्थ किताब से लिखें

प्रस्तुत पंक्तियों के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1.  “आप न कहें ------ सारे दिन वही रहता था।”

प्रश्न 1 प्रस्तुत पंक्तियाँ किसने किससे कही हैं?

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ चंद्रप्रकाश द्वारा ठाकुर व ठकुराइन से कही गई हैं।

प्रश्न 2 चंद्रप्रकाश ने घर क्यों छोड़ दिया था?

उत्तर – ठाकुर साहब के घर में चंद्रप्रकाश ने चोरी की थी। अतः उसे पकड़े जाने का डर था इसलिए उसने स्वयं का बचाव करने हेतु घर छोड़ दिया था।

प्रश्न 3 ठाकुर और ठकुराइन चंद्रप्रकाश के विषय में क्या विचार रखते थे?

उत्तर – ठाकुर और ठकुराइन चंद्रप्रकाश का बहुत आदर करते थे। उसे अपना लड़का समझते थे। उस पर बहुत विश्वास करते थे।

प्रश्न 4 चंद्रप्रकाश कहाँ रहता था?

उत्तर – चंद्रप्रकाश ठाकुर साहब दिये घर/मकान में रहता था। यह मकान ठाकुर साहब के घर से बिलकुल मिला हुआ था।

2.  “बड़ी मुबारक दावत थी तुम्हारी ------ हुई।”

प्रश्न-1 प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता व श्रोता का नाम बताइए।

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति के वक्ता ठाकुर साहब तथा श्रोता चंद्रप्रकाश हैं।

प्रश्न-2 ठाकुर साहब के गहने वापस कैसे मिले?

उत्तर- ठाकुर साहब के घर से चंद्रप्रकाश ने ही गहने चुराए थे तथा वह यह बात अपनी पत्नी चंपा से छिपाकर रखता था। जब उसकी पत्नी को चंद्रप्रकाश की चोरी का पता चला तो वह उदास रहने लगी। जिस दिन नौकरी लगने की खुशी से चंद्रप्रकाश ने ठाकुर साहब को सपरिवार दावत के लिए बुलाया तो मौका देखकर चंद्रप्रकाश ने चोरी किया सामान वापस ठाकुर साहब के घर में रख दिया।

प्रश्न-3 चंपा के चरित्र की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर- स्वाभिमानी व ईमानदार थी। बड़ों का भी आदर करती थी। उसने चंद्रप्रकाश के चोरी करने पर उसका साथ नहीं दिया अर्थात वह लोभी स्त्री भी नहीं थी।

 

Clas 8 Ch 8, मन भावन सावन कविता

पाठ - 6  मन भवान सावन  पुस्तक से कविता के शब्द अर्थ करें। • नीचे दिए गई पंक्तियों को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:- झम-झम_ _ _ _...