कक्षा 7
पाठ 3 नीति- श्लोक
श्लोक: विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मः ततः सुखम्।।
सरल अनुवाद: विद्या (ज्ञान) हमें विनम्रता देती है। विनम्रता से इंसान में योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता होने से धन की प्राप्ति होती है, धन से इंसान धर्म के कार्य (अच्छे काम) करता है और अंत में उसे सुख मिलता है।
सीख: अगर हम अच्छे से पढ़ाई करेंगे, तो हमारे जीवन में सुख-शांति अपने आप आ जाएगी।
2. दूसरा श्लोक
श्लोक: आचारः प्रथमो धर्मः, आचारः परमं तपः।
आचारः परमं ज्ञानम्, आचारात् किं न सिध्यति।।
सरल अनुवाद: अच्छा आचरण (अच्छा व्यवहार या संस्कार) ही सबसे पहला धर्म है। अच्छा आचरण ही सबसे बड़ी तपस्या है और अच्छा आचरण ही सबसे बड़ा ज्ञान है। अच्छे आचरण से दुनिया में ऐसा क्या है जो हासिल नहीं किया जा सकता? (अर्थात, अच्छे व्यवहार से सब कुछ मिल सकता है)।
सीख: हमें हमेशा सबके साथ तमीज और अच्छे संस्कार से पेश आना चाहिए।
3. तीसरा श्लोक
श्लोक: प्रिय-वाक्य-प्रदानेन, सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं, वचने का दरिद्रता।।
सरल अनुवाद: मीठे और प्यारे वचन (बोल) बोलने से सभी जीव-जंतु और इंसान खुश हो जाते हैं। इसलिए हमें हमेशा मीठी वाणी ही बोलनी चाहिए। भला अच्छे और मीठे बोल बोलने में कैसी कंजूसी (दरिद्रता)?
सीख: हमेशा सबसे प्यार से बात करनी चाहिए, क्योंकि मीठा बोलने में कोई पैसे नहीं लगते!
4. चौथा श्लोक
श्लोक: छायामन्यस्य कुर्वन्ति, स्वयं तिष्ठन्ति आतपे।
फलान्यपि परार्थाय, वृक्षाः सत्पुरुषाः इव।।
सरल अनुवाद: पेड़ खुद तो कड़ी धूप में खड़े रहते हैं, लेकिन दूसरों को ठंडी छाया देते हैं। उनके फल भी दूसरों के भले के लिए (खाने के लिए) ही होते हैं। सचमुच, पेड़ सज्जन (अच्छे) लोगों की तरह होते हैं, जो हमेशा दूसरों की मदद करते हैं।
सीख: हमें भी पेड़ों की तरह परोपकारी बनना चाहिए और दूसरों की मदद करनी चाहिए।
5. पांचवां श्लोक
श्लोक: प्राणान् त्यजति देशाय, पीडितानां सहायकः।
यः आचरति कल्याणं, लोके मानं सः विन्दति।।
सरल अनुवाद: जो इंसान अपने देश के लिए अपने प्राण तक दे देता है, जो दुखियों और पीड़ितों की मदद करता है और जो हमेशा सबका भला (कल्याण) करता है—वही इंसान इस संसार में सच्चा सम्मान और आदर पाता है।
सीख: देशप्रेम और दूसरों की सेवा करने वाले इंसान को दुनिया हमेशा याद रखती है।
6. छठा श्लोक
श्लोक: जाड्यं धियो हरति, सिञ्चति वाचि सत्यम्,
मानोन्नतिं दिशति, पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति, दिक्षु तनोति कीर्तिम्,
सत्सङ्गतिः कथय, किं न करोति पुंसाम्।।
सरल अनुवाद: अच्छी संगति (सत्सङ्गति) इंसान के लिए क्या-क्या नहीं करती?
यह बुद्धि की मूर्खता को दूर करती है।
हमारी वाणी (बोली) में सच्चाई भरती है।
समाज में मान-सम्मान बढ़ाती है।
हमें पाप और गलत कामों से बचाती है।
हमारे मन को खुश रखती है।
चारों दिशाओं में हमारा यश (नाम) फैलाती है।
सच कहो, अच्छे दोस्तों की संगति इंसान का हर तरह से भला करती है!
सीख: हमें हमेशा अच्छे और संस्कारी बच्चों को ही अपना दोस्त बनाना चाहिए।
No comments:
Post a Comment