एक समय की बात है, भगवान् विष्णु (हरि) ने स्वर्ग और नरक का निर्माण किया। उन्होंने इन्द्र को स्वर्ग का स्वामी बनाया और यमराज को नरक का स्वामी बनाया।
उस दिन से स्वर्ग में प्रतिदिन लोग आने लगे। लेकिन यमलोक (नरक) में किसी का भी आगमन नहीं होता था। इस कारण स्वर्ग जीवंत और आनंदमय हो गया, जबकि नरक निष्क्रिय और सुनसान पड़ा रहने लगा।
नरक की इस निष्क्रियता को देखकर यमराज चिंतित हो गए। वे अपना अधिकार छोड़ने के लिए भगवान् हरि के पास गए और प्रार्थना करने लगे —
“भगवन्! मैं अपना अधिकार छोड़ना चाहता हूँ। कृपया मुझे इस भार से मुक्ति प्रदान करें।”
हरि ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा — “भगवान्! आप इस प्रकार क्यों चिंतित हैं? यह तो स्वाभाविक है। पृथ्वीलोक में लोग धार्मिक और नैतिक गुणों से सम्पन्न हैं, इसलिए वे स्वर्ग ही आते हैं।”
भगवान् हरि के ये वचन सुनकर यमराज संतुष्ट हो गए और चुप हो गए।
उसी समय भगवान् हरि के पास बैठी कमला (लक्ष्मी) ने उनसे प्रार्थना की —
“भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के निवासियों को स्वर्ग प्राप्ति का रहस्य जानना चाहती हूँ। अतः आप और मैं वहाँ चलकर देखें।”
तब कमला हरि के साथ पृथ्वीलोक चली गईं। यमराज भी उनके साथ गए।
वहाँ उन्होंने देखा कि पृथ्वीलोक के सभी लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। उनका जीवन तपस्या के योग्य था। शहरों और गाँवों में मजदूर और किसान पूरी लगन से काम कर रहे थे।
इन्हीं लोगों के परिश्रम से पृथ्वीलोक में सुख और समृद्धि सुशोभित हो रही थी। इसलिए अंत में वे सभी स्वर्गलोक को प्राप्त करते थे।
तब कमला ने कहा — “भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के लोगों को स्वयं यह वरदान देना चाहती हूँ।”
भगवान् हरि की आज्ञा से कमला पृथ्वीलोक में रहने लगीं।
तब से पृथ्वीवासी कमला के वैभव (धन-समृद्धि) के लोभ में पड़ गए। वे परिश्रम कम करने लगे। परिश्रम के त्याग से उनके सुख और समृद्धि नष्ट होने लगी, सदाचार समाप्त हो गया। वे भ्रष्टाचारी बन गए और अंत में नरक जाने लगे।
यह देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए और अपने लोक लौट आए।
तब भगवान् हरि ने कमला से कहा —
“देवि! अब तुम्हें पृथ्वीलोक की सुख-समृद्धि का रहस्य ज्ञात हो गया।”
**परिश्रमैव समृद्धेः मूलम्।**
**अर्थात् — परिश्रम ही समृद्धि का मूल है।**
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**मुख्य संदेश:**
**मेहनत ही सफलता और समृद्धि की कुंजी है।**
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