Thursday, 20 August 2026

Clas 8 Ch 8, मन भावन सावन कविता

पाठ - 6 
मन भवान सावन 

पुस्तक से कविता के शब्द अर्थ करें।
• नीचे दिए गई पंक्तियों को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:-

झम-झम_ _ _ _ _ _ _ घन के।
प्रश्न 1 : बिजली कैसे और किसके उर में चमकती है?
उत्तर : जब आसमान में घनघोर बादल छाए रहते हैं, तब बिजली तेज आवाज के साथ आसमान में गरजती है। ऐसा लगता है मानो बादलों को चीरती हुई पृथ्वी पर आ गिरी हो और तेज़ गड़गड़ाहट की आवाज करती है।

प्रश्न 2 : कविता में कवि ने किस ऋतु का वर्णन किया है?
उत्तर : कविता में कवि ने वर्षा ऋतु में आने वाले सावन के महीने का वर्णन किया है।

प्रश्न 3 : सावन के मेघ कैसे बरसते हैं?
उत्तर : सावन के मेघ झम-झम बरसते हैं और उनकी छन-छम करती बूंदें पेड़ों की शाखाओं से छन-छन कर गिरती हैं।

प्रश्न 4 : कविता व उसके रचयिता का नाम बताइए।
उत्तर : कविता का नाम 'मन भावन सावन' है तथा रचयिता का नाम 'सुमित्रानंदन पंत जी' है।

प्रश्न 5 : तरुओं, उर, तम शब्दों के अर्थ बताइए।
उत्तर : वृक्षों, हृदय, अंधकार।

 2. नाच रहे पागल हो _ _ _ _ _ _ _ गर्जन।
प्र०1 : सावन में मेघ किस प्रकार की ध्वनि करते हुए बरसते हैं?
उ०1 : सावन में मेघ झम-झम की ध्वनि करते हुए बरसते हैं।

प्र०2 : पीपल और नीम अपनी प्रसन्नता किस प्रकार प्रकट करते हैं?
उ०2 : दोनों पीपल और नीम झूम-झूमकर आनंदित हो रहे हैं और दोनों खुशी के साथ नाच रहे हैं।

प्र०3 : कवि ने सावन के गीत किस झूले में बैठकर गाने की इच्छा प्रकट की  है?
उ०3 : कवि ने सावन के गीत इंद्रधनुष के झूले में बैठकर गाने की इच्छा प्रकट की है।

प्र०4 : सावन में प्रकृति की शोभा का वर्णन कीजिए:-
उ०4 : सावन ऋतु में प्रकृति अत्यधिक सुन्दर दिखाई देती है। चारों ओर प्रसन्नता व हरियाली छाई रहती है भ्रमर व मयूर प्रसन्न होकर गुंजार व नृत्य करने लगते हैं। वृक्षों की शाखाओं पर झूले डल जाते हैं और सभी जगह फूलों की सुगंध से वातावरण सुगंधित हो उठता है।

प्र० 5 : इस कविता से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उ० 5 : इस कविता से हमें प्रेरणा मिलती है कि प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आचरण और व्यवहार द्वारा जन-जन के जीवन में सावन का उल्लास भरने का प्रयास करें।


Wednesday, 12 August 2026

Class 8 संस्कृत पाठ 5 : दिल्ली नगरम

दिल्ली नगर भारतवर्ष की राजधानी है। यह नगर अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक है। इसका पुराना नाम 'इंद्रप्रस्थ' था। भारत के केंद्र में स्थित होने के कारण यह नगर अति प्राचीन काल से देश की राजधानी होने का गौरव वहन कर रहा है। आज भी यह स्वतंत्र भारत की राजधानी है। केंद्र सरकार के सर्वोच्च अधिकारी और विदेशों के प्रतिनिधि यहीं निवास करते हैं।
दिल्ली नगर में भारत के विभिन्न प्रदेशों के निवासी आसानी से देखे जा सकते हैं। दूर-दूर से आकर लोग यहाँ प्राचीन और नवीन अनेक दर्शनीय स्थलों को देखकर अपना मनोरंजन करते हैं।
दिल्ली नगर का प्राचीन भाग 'पुराणी दिल्ली' नाम से जाना जाता है, और वहाँ 'चांदनी चौक', 'लाल किला', 'जामा मस्जिद', 'यमुना पुल' तथा 'राजघाट' नाम के दर्शनीय स्थान हैं। पुरानी दिल्ली भाग के भवन प्राचीन शैली में निर्मित हैं। वहाँ भारत की संस्कृति और कला झलकती है। दिल्ली नगर का नया भाग 'नई दिल्ली' नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ चिड़ियाघर, बिड़ला मंदिर, जंतर-मंतर और कुतुब मीनार प्रसिद्ध स्थान हैं। जब दिल्ली नगर में 'एशियाड 82' (1982 के एशियाई खेल) का आयोजन हुआ था, उसी आयोजन से इस नगर की शोभा अत्यंत बढ़ गई थी।
यहाँ नेहरू स्टेडियम, नेशनल स्टेडियम और इंदिरा गांधी (इंद्रप्रस्थ) स्टेडियम आदि विभिन्न विशाल खेल के मैदान भली-भांति निर्मित हैं। ऊँचे फ्लाईओवर (पारगमन पथ) सुंदर प्रतीत होते हैं। नई दिल्ली नगर में मार्ग अत्यंत चौड़े, सुव्यवस्थित और स्वच्छ हैं। रात में यहाँ विभिन्न प्रकार की बत्तियों (लाइटों) का प्रकाश बहुत सुशोभित होता है। यहाँ अनेक प्रकार के वाहनों का बहुत बड़ा आवागमन रहता है। पालम में स्थित हवाई अड्डा अत्यंत दर्शनीय है।
दिल्ली नगर व्यापार और उद्योगों का भी केंद्र है। यह संपूर्ण संसार की राजनीतिक गतिविधियों का भी केंद्र है। अतः यह नगर अत्यंत समृद्ध, वैभवशाली और सुंदर है।

Class 8, पाठ 4: परिश्रमैव समृद्धेः मूलम्



एक समय की बात है, भगवान् विष्णु (हरि) ने स्वर्ग और नरक का निर्माण किया। उन्होंने इन्द्र को स्वर्ग का स्वामी बनाया और यमराज को नरक का स्वामी बनाया।

उस दिन से स्वर्ग में प्रतिदिन लोग आने लगे। लेकिन यमलोक (नरक) में किसी का भी आगमन नहीं होता था। इस कारण स्वर्ग जीवंत और आनंदमय हो गया, जबकि नरक निष्क्रिय और सुनसान पड़ा रहने लगा।

नरक की इस निष्क्रियता को देखकर यमराज चिंतित हो गए। वे अपना अधिकार छोड़ने के लिए भगवान् हरि के पास गए और प्रार्थना करने लगे — 

“भगवन्! मैं अपना अधिकार छोड़ना चाहता हूँ। कृपया मुझे इस भार से मुक्ति प्रदान करें।”

हरि ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा — “भगवान्! आप इस प्रकार क्यों चिंतित हैं? यह तो स्वाभाविक है। पृथ्वीलोक में लोग धार्मिक और नैतिक गुणों से सम्पन्न हैं, इसलिए वे स्वर्ग ही आते हैं।”

भगवान् हरि के ये वचन सुनकर यमराज संतुष्ट हो गए और चुप हो गए।

उसी समय भगवान् हरि के पास बैठी कमला (लक्ष्मी) ने उनसे प्रार्थना की — 

“भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के निवासियों को स्वर्ग प्राप्ति का रहस्य जानना चाहती हूँ। अतः आप और मैं वहाँ चलकर देखें।”

तब कमला हरि के साथ पृथ्वीलोक चली गईं। यमराज भी उनके साथ गए।

वहाँ उन्होंने देखा कि पृथ्वीलोक के सभी लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। उनका जीवन तपस्या के योग्य था। शहरों और गाँवों में मजदूर और किसान पूरी लगन से काम कर रहे थे। 

इन्हीं लोगों के परिश्रम से पृथ्वीलोक में सुख और समृद्धि सुशोभित हो रही थी। इसलिए अंत में वे सभी स्वर्गलोक को प्राप्त करते थे।

तब कमला ने कहा — “भगवन्! मैं पृथ्वीलोक के लोगों को स्वयं यह वरदान देना चाहती हूँ।”

भगवान् हरि की आज्ञा से कमला पृथ्वीलोक में रहने लगीं।

तब से पृथ्वीवासी कमला के वैभव (धन-समृद्धि) के लोभ में पड़ गए। वे परिश्रम कम करने लगे। परिश्रम के त्याग से उनके सुख और समृद्धि नष्ट होने लगी, सदाचार समाप्त हो गया। वे भ्रष्टाचारी बन गए और अंत में नरक जाने लगे।

यह देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए और अपने लोक लौट आए।

तब भगवान् हरि ने कमला से कहा — 

“देवि! अब तुम्हें पृथ्वीलोक की सुख-समृद्धि का रहस्य ज्ञात हो गया 
 — परिश्रम ही समृद्धि का मूल है।**


Clas 8 Ch 8, मन भावन सावन कविता

पाठ - 6  मन भवान सावन  पुस्तक से कविता के शब्द अर्थ करें। • नीचे दिए गई पंक्तियों को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:- झम-झम_ _ _ _...