Monday, 19 January 2026

Class 7 : पाठ 15 : चरणस्पर्शस्य महत्वम्



चरणस्पर्श का महत्व अद्वितीय है। प्राचीन काल से ही प्रातः उठकर माता-पिता, गुरुजनों तथा बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की परंपरा चली आ रही है। ऐसा माना जाता है कि जब हम किसी के चरणों का स्पर्श करते हैं, तो उस व्यक्ति की चुम्बकीय तरंगें हमें विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा के रूप में प्राप्त होती हैं। इससे दोनों के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित होता है। साथ ही चरणस्पर्श के द्वारा हम उस व्यक्ति के भीतर स्थित ईश्वर को भी प्रणाम करते हैं।

महाभारत के युद्ध के आरंभ से पूर्व धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ गुरुजनों के चरण स्पर्श करने के लिए शत्रुपक्ष में जाते हैं। वहाँ जाकर वे पितामह भीष्म के चरण स्पर्श करते हैं। सभी कौरव हँसने लगते हैं और कटाक्ष करते हुए कहते हैं— “ये लोग डर गए हैं।”
पितामह पूछते हैं— “हे पुत्र! क्या युद्ध का भय लगने के कारण तुम आए हो?”
युधिष्ठिर नम्रता से उत्तर देते हैं— “युद्ध की चिंता तो युद्ध में ही होगी। अभी तो हम युद्ध से पहले क्षमा याचना करने आए हैं। बचपन में हम आपकी गोद में खेला करते थे। आप हमारे पूज्य हैं। युद्ध में हमसे कोई अपराध हो जाए, यह हमें ज्ञात नहीं है, इसलिए पहले ही क्षमा माँग रहे हैं। कृपया हमारे अपराध को क्षमा करें।”

आँखों में आँसू भरकर पितामह स्नेहपूर्वक आशीर्वाद देते हैं— “दीर्घायु होओ, विजयी बनो।”

यह देखकर क्रोधित दुर्योधन भीष्म पितामह से कहता है— “पितामह! यदि आप इन शत्रुओं की सफलता की कामना करते हैं, तो उनके पक्ष में जाकर युद्ध कीजिए।”
पितामह उत्तर देते हैं— “आशीर्वाद मेरे वश में नहीं होता। जब कोई व्यक्ति किसी के चरण स्पर्श कर प्रणाम करता है, तब हृदय और मस्तिष्क पर नियंत्रण नहीं रहता। हाथ स्वयं ही आशीर्वाद देने के लिए आगे बढ़ जाता है।”

जब पांडवों ने द्रोणाचार्य और कृपाचार्य के चरणों में प्रणाम किया, तो वे कुछ बोले नहीं, किंतु उनके हृदय ने कहा— “तुम सब धर्म के पक्ष में हो और धर्म तुम्हारे साथ है। हमारा शरीर भले ही यहाँ है, पर हमारा हृदय तुम्हारे पक्ष में है। तुम सदा विजय प्राप्त करो।”

यही चरणस्पर्श का चमत्कार है। चरणस्पर्श अहंकार का नाश करता है, विनम्रता उत्पन्न करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। युधिष्ठिर ने युद्ध से पहले ही आशीर्वाद के बल पर आधी विजय प्राप्त कर ली थी।

चरणस्पर्श हमारी संस्कृति का जीवंत अंग है। आचार्य मनु ने भी कहा है—

**“जो व्यक्ति अभिवादनशील होता है और सदैव वृद्धों की सेवा करता है,
उसकी आयु, विद्या, यश और बल— ये चारों निरंतर बढ़ते हैं।”**

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