जब अष्टावक्र अपनी माता के गर्भ में थे, तब सुजाता की वेद-मंत्रों को सुनने में रुचि कम हो गई थी। एक बार गर्भ के आठवें महीने में अष्टावक्र ने माता के मुख से पिता से कहा—
“केवल वेदों के अध्ययन से ही ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। हे तात! यदि आप आत्मा को जान लें, तो सब कुछ जान लेंगे।”
यह सुनकर पिता कहोड़ क्रोधित हो गए। भयभीत सुजाता ने कहा—
“हे नाथ! मैंने कुछ भी नहीं कहा है। मैं कभी वेदों का विरोध नहीं करती।”
कहोड़ ने उत्तर दिया—
“सुजाते! मैं तुम्हें वर्षों से जानता हूँ। मुझे विश्वास है कि यह शिशु की वाणी है, जो तुम्हारे मुख से प्रकट हुई है।”
यह घटना दो-तीन बार हुई। अष्टावक्र ने कहा—
“ज्ञान को ग्रंथों में मत खोजिए, अपने आत्मस्वरूप को जानिए।”
अंत में पिता ने क्रोधित होकर उसे शाप दे दिया—
“तुमने वेदों की आलोचना की है। तुम्हें अवश्य दंड मिलेगा। तुम आठ स्थानों से विकलांग हो जाओगे।”
इसके बाद शिशु ने कुछ नहीं कहा। जब अष्टावक्र का जन्म हुआ, तब उसका शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था। इसी कारण उसका नाम अष्टावक्र पड़ा।
बारह वर्ष की आयु में वह अपने पिता की खोज में राजा जनक की सभा में पहुँचा। वहाँ उसने सभासदों के साथ शास्त्रार्थ किया और सभी को पराजित किया। उसने राजा जनक को भी आत्मज्ञान दिया और अपने पिता को जल-समाधि से मुक्त कराया।
इसके बाद पिता प्रसन्न होकर पुत्र अष्टावक्र से समंदा नदी में स्नान करने को बोले। पिता के आशीर्वाद से स्नान के बाद अष्टावक्र का शरीर सामान्य हो गया।
राजा जनक और अष्टावक्र के बीच हुआ संवाद “अष्टावक्र गीता” के नाम से प्रसिद्ध है।
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