भो पराग। वर्तमान छात्र-वर्ग में तो उदंडता, अनुशासनहीनता, स्वार्थांधता, गुरुओं के प्रति अश्रद्धा तो उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। कल भी समाचारपत्र में ऐसा एक समाचार था।
परागः
सत्य कहते हो उदित, अत्यंत शोचनीय है यह स्थिति। प्राचीन काल में भारतवर्ष में पवित्रतम गुरु-शिष्य संबंध था। आठ वर्षीय बालक ज्ञान के लिए गुरु के पास गुरुकुल जाता था। पंद्रह वर्षों तक ज्ञान प्राप्त करता था। गुरु की सेवा से आयु, विद्या, यश और बल प्राप्त करता था। शिष्य आज्ञापालन से, भिक्षाचरण से, पशुचारण से, समिधा आहरण से और श्रद्धाभाव से गुरु की सेवा करते थे।
उदितः
हाँ, मैंने पढ़ा है वह श्लोक- गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:॥
परागः
क्या तुम इस श्लोक का अर्थ जानते हो?
उदितः
नहीं जानता!
परागः
गुरु शिष्य के हृदय में ज्ञान उत्पन्न करता है इसलिए गुरु ब्रह्मा है। गुरु अज्ञान से बचाता है और ज्ञान को पोषित करता है इसलिए गुरु विष्णु है। गुरु शिष्य के समस्त दोषों को नाश करता है इसलिए गुरु महेश्वर है। गुरु इस प्रकार ब्रह्मविद्या को सिखाता है इसलिए गुरु परब्रह्म भी है।
उदितः
अत्युत्तम। 'आचार्यदेवो भव' यह मैं स्मरण करता हूँ। गुरु पूर्णिमा कब होती है? उसका क्या महत्व है?
परागः
आषाढ़ मास के (जुलाई-अगस्त) पूर्ण चंद्र के दिन गुरु पूर्णिमा होती है। इस दिन महाभारत के रचनाकार का जन्मदिन है। इसलिए यह दिन 'व्यास पूर्णिमा' रूप में भी मान्य है।
उदितः
व्यास पूर्णिमा?
परागः
हाँ। महर्षि वेदव्यास की पुण्य स्मृति में यह उत्सव मनाया जाता है। महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास ने संस्कृत साहित्य में महान कार्य किया। उन्होंने वैदिक मंत्रों का संकलन करके चार भागों में विभाजित किया। चार विभाग अर्थात् चार वेद: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। उसके बाद उन्होंने चार शिष्यों को वेद पढ़ाए। पुराणों की रचना भी की।
व्यास ने ऐसा किया। पुराण पांचवें वेद के रूप में भी प्रसिद्ध हैं।
उदित
शोभन। मैं तो केवल शिक्षक दिवस के बारे में जानता हूँ। क्या गुरु पूर्णिमा में छात्र गुरु की सेवा करते हैं?
परागः
हाँ। इस दिन शिष्य अपने आध्यात्मिक गुरु और आदर्श शिक्षकों की पूजा करते हैं। वे अपने गुरु को उच्च आसन पर बिठाकर चरण धोते हैं और दुग्धाभिषेक करते हैं। कुमकुम और अक्षत से तिलक करके पुष्प और मिष्ठान्न अर्पित करते हैं। गुरु और शिक्षक शिष्यों और छात्रों को यथेष्ट आशीर्वाद देते हैं। वे शिष्यों को उत्तम कार्य के लिए प्रेरणा भी देते हैं।
उदितः
मेरा गुरु मुझे अत्यंत पसंद है। वह सदैव मृदु वाणी से बोलता है। गुरवे नम:।
दोनों
हम दोनों मिलकर पवित्र गुरु-शिष्य संबंधों को पुनर्जीवित करें।
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