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### 1. गीता 4.39
**श्लोक:**
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
**हिंदी अनुवाद:**
जो श्रद्धावान है, साधना में तत्पर रहता है और जिसकी इंद्रियाँ संयमित हैं, वह ज्ञान प्राप्त करता है।
ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।
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### 2. गीता 3.21
**श्लोक:**
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
**हिंदी अनुवाद:**
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वही करते हैं।
वह जो आदर्श स्थापित करता है, समस्त समाज उसी का अनुसरण करता है।
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### 3. गीता 2.47
**श्लोक:**
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
**हिंदी अनुवाद:**
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं।
इसलिए कर्मफल का कारण बनने की इच्छा मत करो और कर्म न करने में भी आसक्ति मत रखो।
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### 4. गीता 2.48
**श्लोक:**
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
**हिंदी अनुवाद:**
हे अर्जुन! आसक्ति को त्यागकर योग में स्थित होकर कर्म करो।
सफलता और असफलता में समान भाव रखना ही योग कहलाता है।
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. गीता 2.56
**श्लोक:**
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
**हिंदी अनुवाद:**
जो दुःखों में विचलित नहीं होता, सुखों में जिसकी इच्छा समाप्त हो चुकी है,
और जो राग, भय तथा क्रोध से मुक्त है— वही स्थितप्रज्ञ मुनि कहलाता है।
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