‘भारत रत्न’ पुरस्कार भारत का सर्वोच्च सम्मान है। ‘भारत रत्न’ का अर्थ है— *Gem of India*, अर्थात भारत का अमूल्य नागरिक। भारत सरकार यह पुरस्कार देश के प्रतिष्ठित और गणमान्य नागरिकों को उनके प्रेरणादायक कार्यों के लिए प्रदान करती है। ‘भारत रत्न’ यह सिखाता है कि जीवन में सफलता प्राप्त करने का कोई सरल या आसान मार्ग नहीं होता। व्यक्तिगत जीवन हो या व्यावसायिक जीवन— उच्चतम लक्ष्य को पाने के लिए परिश्रम के साथ-साथ चरित्र की भी आवश्यकता होती है।
‘भारत रत्न’ पुरस्कार के लिए व्यक्तियों का चयन स्वयं भारत के राष्ट्रपति करते हैं। इस सम्मान के साथ कोई धनराशि नहीं दी जाती। इस पुरस्कार में पीपल के पत्ते पर सूर्य का चित्र बना होता है, जिसके साथ ‘भारत रत्न’ लिखा रहता है। यह ऊर्जा और जीवन का प्रतीक है। इस पुरस्कार के साथ भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रमाणित एक प्रशस्ति-पत्र भी दिया जाता है।
वर्ष 1963 में महाराष्ट्र निवासी महान इतिहासकार तथा संस्कृत जगत के अत्युत्तम विद्वान डॉ. पांडुरंग वामन काणे को भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
पांडुरंग महोदय का जन्म वर्ष 1880 में हुआ था। छात्र जीवन में ही उन्होंने सात स्वर्ण पदक प्राप्त किए थे। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय में अनेक वर्षों तक अध्यापन और शोध कार्य किया। बाद में वे उसी विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी बने। भारत में उन्होंने अनेक संस्थाओं के साथ मिलकर संस्कृत कार्य किया। विदेशों में भी विभिन्न सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। पांडुरंग महोदय ने लगभग 40 वर्षों तक शोध कार्य किया। उन्होंने 6500 पृष्ठों का ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ नामक ग्रंथ लिखा। पांडुरंग महोदय को भारत सरकार द्वारा ‘महामहोपाध्याय’ की उपाधि भी प्रदान की गई।
वर्ष 1990 में भारतीय संविधान के निर्माता, संस्कृत प्रेमी, राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री डॉ. भीमराव आंबेडकर को भी ‘भारत रत्न’ सम्मान प्राप्त हुआ। डॉ. आंबेडकर का जन्म 1891 में हुआ था। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र और न्यायशास्त्र का अध्ययन किया। डॉ. आंबेडकर को संस्कृत भाषा से गहरा प्रेम था। संविधान निर्माण के समय उन्होंने राजभाषा के रूप में संस्कृत भाषा का प्रस्ताव रखा था। वे एक उत्तम संस्कृत वक्ता भी थे।
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