(जुलाई का महीना। विद्यालय में शिक्षिका और छात्र बातचीत कर रहे हैं।)
**शिक्षिका** – प्रिय छात्रों! तुम लोग पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कुछ करो। बताओ, तुम सब मिलकर क्या करोगे?
**छात्र** –
हम वृक्ष लगाएँगे।
**शिक्षिका** – क्यों?
**सेवन्ती** – पर्यावरण की रक्षा में ही हमारी रक्षा है। हम सब पर्यावरण की रक्षा के लिए तत्पर रहें। यदि वृक्ष नहीं होंगे तो जीवन असंभव हो जाएगा।
**अभिनव** – वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इससे पर्यावरण में वायु का संतुलन बना रहता है।
**हेमन्त** – इसलिए हम सभी कार्यालयों, संस्थानों, विद्यालयों और घरों में वृक्षों तथा वनों के संरक्षण के लिए वन महोत्सव का आयोजन करें।
**शिक्षिका** – वन महोत्सव कब मनाया जाता है? क्या तुम जानते हो?
**शिशिर** – जुलाई महीने में वर्षा ऋतु होती है, इसलिए जुलाई महीने के पहले सप्ताह में।
**शिक्षिका** – बहुत अच्छा। क्या तुम जानते हो कि वनों की आवश्यकता क्यों होती है?
**अशोक** – हाँ महोदया। वनों से ही हमें लकड़ी, फल, औषधियाँ, ईंधन आदि प्राप्त होते हैं।
**शिक्षिका** – यह सत्य है। वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा ही नहीं बढ़ाते, बल्कि वायुमंडल में ठंडक और नमी का भी संरक्षण करते हैं। उनकी जड़ों में गया हुआ जल धरती में समा जाता है। जहाँ घने वन होते हैं, वहाँ अधिक वर्षा भी होती है।
**वसन्त** – तब हमें प्लास्टिक की थैलियों और अन्य कचरे का भी निषेध करना चाहिए, जिससे हमारी भूमि स्वच्छ रहे। भविष्य में हम शुद्ध जल और वायु से वंचित न हों। आओ सभी, मिलकर वृक्षारोपण करें।
(सभी विद्यालय के खेल मैदान में जाते हैं।)
**शिक्षिका** – हम सब अलग-अलग समूहों में बँट जाएँ। खेल मैदान के चारों ओर पौधे और वृक्ष लगाएँ। मालती, लता, अशोक! तुम लोग तरणताल के पास जाओ। अरे सरबजीत! तुम पानी की व्यवस्था देखो।
**रोजी** –
महोदया, मैं विवेक, खालिदा और मानस के साथ फावड़े से गड्ढे खोदूँगी।
**शिक्षिका** – ठीक है। अरे राजीव! सरबजीत अभी तक नहीं आया है। तुम जाकर देखो।
**नेहा** –
मैं पीपल, केला, अशोक और तुलसी के पौधे लगाऊँगी।
(सभी प्रसन्नता से पौधों का रोपण करते हैं।)
**शिक्षिका** – हम सबने मिलकर पौधारोपण किया, लेकिन उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य है उनका संरक्षण। अरे संजना! तुम सभी छात्रों की सूची बनाओ और यह भी लिखो कि कौन-कौन किस वृक्ष की देखभाल और रक्षा करेगा।
**वृक्ष हमारे मित्र हैं और दस पुत्रों के समान हैं।
इस प्रकार सोचकर सदा वृक्षों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।**
No comments:
Post a Comment