एक दिन संयोग से समुद्र का एक मेंढक उस कुएँ में गिर पड़ा। कुएँ के मेंढक ने उससे बातचीत की।
स्वागत है! तुम कहाँ से आए हो?
मैं वर्षा के जलप्रवाह के साथ समुद्र से यहाँ आया हूँ।
स्वागत है! क्या समुद्र भी कुएँ के समान होता है?
(आश्चर्य से हँसते हुए) अरे मित्र!
तुम समुद्र की तुलना कुएँ से कैसे कर सकते हो?
क्या तुम्हारा समुद्र कुएँ जितना बड़ा है?
तुम कितनी विचित्र बात कर रहे हो! समुद्र की तुलना कुएँ से! हा-हा-हा! समुद्र तो बहुत विशाल है।
(क्रोध में) मेरे कुएँ से बड़ा कुछ भी नहीं हो सकता। समुद्र तो छोटा ही होगा। इस मेंढक को कुएँ से बाहर निकाल दो।
हम सब कुएँ के मेंढक ही हैं। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन आदि—हम सब यही सोचते हैं कि “हमारा ही धर्म श्रेष्ठ है।” हमें लगता है कि पूरा विश्व हमारे ही कुएँ में समाया हुआ है। हमारे लिए हमारा कुआँ ही पूरा ब्रह्मांड है।
“हम ही श्रेष्ठ हैं” ऐसी तुच्छ सोच से दूसरों का अपमान नहीं करना चाहिए। ऐसी संकीर्ण भावना ही हमारे विकास में बाधा बनती है। यही भावना संघर्ष और कलह का कारण है। हमें वेद के इस वाक्य का अनुसरण करना चाहिए— “वसुधैव कुटुम्बकम्”, अर्थात पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
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