एक बार एक शिकारी उस नगर में आया। उसने बरगद के पेड़ के नीचे जाल फैलाकर उसके ऊपर चावल के दाने बिखेर दिए, और स्वयं पास में ही छिपकर बैठ गया।
इसके बाद चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा आकाश में उड़ रहा था। उसके साथ बहुत से कबूतर भी थे। जब उन्होंने धरती पर चावल के दाने देखे, तब वे उन्हें खाने के लिए नीचे आए। इस प्रकार वे सभी लालच के कारण जाल में फँस गए।
चित्रग्रीव बहुत बुद्धिमान था। उसने शिकारी को देखकर कबूतरों से कहा—
"तुम सब चिंताकुल (व्याकुल) मत हो, बल्कि इस जाल को लेकर साथ ही शीघ्रता से उड़ जाओ।"
चित्रग्रीव के कहने के अनुसार सभी कबूतर जाल के साथ ही उड़ गए।
चित्रग्रीव कबूतरों को वन के उस भाग में ले गया, जहाँ हिरण्यक नाम का चूहा रहता था। हिरण्यक उसका मित्र था। चित्रग्रीव के आदेश से सभी कबूतर वहाँ उतरे।
चित्रग्रीव ने हिरण्यक को सारा वृत्तान्त (हाल) बताया और प्रार्थना की— "हे मित्र! इस जाल को काटकर मेरे परिवारजनों (साथियों) को बंधन से मुक्त करो।"
चित्रग्रीव के आग्रह पर हिरण्यक ने शीघ्र ही उनका जाल काट दिया। इस प्रकार वे कबूतर जाल से स्वतंत्र हो गए और उन्होंने पुनः (नया) जीवन प्राप्त किया।
सच ही कहा गया है—
संघे शक्तिः, भेदे नाशः।
(संगठन/एकता में शक्ति होती है और फूट में नाश होता है।)
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