अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशोबलम् ॥ १ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो व्यक्ति अभिवादन (नमस्कार) करने वाला और प्रतिदिन बड़ों (वृद्धों) की सेवा करने वाला होता है, उसके चार चीजें बढ़ती हैं — आयु, विद्या, यश और बल।
2.
संस्कृत:
प्रियवाक्य-प्रवदनेन, सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात्तदेव वक्तव्यम्, वचने का दरिद्रता ॥ २ ॥
हिंदी अनुवाद:
प्रिय वचन (मीठी बात) बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए वही बोलना चाहिए। बातों में दरिद्रता (कंजूसी) क्या है?
3.
संस्कृत:
मनसा चिन्तितं कार्यं, वाचा नैव प्रकाशयेत् ।
मनवद् रहस्यं गूढं, कार्यं चापि नियोजयेत् ॥ ३ ॥
हिंदी अनुवाद:
मन में सोचा हुआ काम वाणी (मुँह) से प्रकट नहीं करना चाहिए। मन की तरह रहस्य को गुप्त रखना चाहिए और कार्य को भी गुप्त रूप से पूरा करना चाहिए।
4.
संस्कृत:
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ ४ ॥
हिंदी अनुवाद:
इस पृथ्वी पर तीन रत्न हैं — जल, अन्न और सुंदर वचन (सुभाषित)। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों में ही रत्न समझते हैं।
5.
संस्कृत:
स्वभावाद् बलमाश्रित्य, यो हि जीवति मानवः ।
स लोके लभते कीर्तिं, परत्र च शुभां गतिम् ॥ ५ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो मानव अपने स्वभाव के बल पर जीवित रहता है, वह इस लोक में कीर्ति (यश) प्राप्त करता है और परलोक में भी शुभ गति प्राप्त करता है।
6.
संस्कृत:
मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पण्डितः ॥ ६ ॥
हिंदी अनुवाद:
जो परायी स्त्रियों को माँ के समान, पराये धन को मिट्टी के ढेले के समान और समस्त प्राणियों को अपने समान देखता है, वही पंडित (सच्चा विद्वान) है।
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